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बेसहारा बच्चों का सहारा बनीं सोपन्ना

विरासत को संभालना, फिर उसे विस्तार देना ही है सोपन्ना के जीवन का ध्येय। विरासत है लल्लू बाबू की। इसमें शामिल हैं सौ विकलांग बच्चे हैं। इन बच्चों की अब हर पल की जिम्मेवारी निभा रही हैं सोपन्ना। लेकिन इसकी शुरुआत तब हुई, जब गृह विभाग में कार्यरत सोपन्ना ने मटवारी स्थित अपने आवास में जगह दी पटना के लल्लू बाबू को। राय विशुन कुमार उर्फ लल्लू बाबू ने वहां सात साल पूर्व विकलांग, अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए आश्रयणी बनायी।ड्ढr पहले सोपन्ना इसमें परोक्ष रूप से सहयोग करती थीं। जिस विभाग में वह रहीं वहां से मदद दिलाती रहीं। इससे सामाजिक समस्या निवारण केंद्र संस्था को आय का साधन मिला और नि:शुल्क आवासीय बाल विकास विद्यालय चलता रहा। दो वर्ष पूर्व लल्लू बाबू का निधन हो गया। तब उनकी विरासत संभाली सोपन्ना ने। अपने संतान की तरह वह इन बच्चों की हर जरूरत और शौक पूरी करती हैं। पढ़ाई से लेकर संगीत तक की। देश के कोने-कोने से आये विकलांग बच्चे-बच्चियों को यहां रखा जाता है। 18 बच्चों से शुरू हुआ यह स्कूल आज 105 विकलांगों का सहारा है। शिक्षा के साथ आत्मनिर्भरता के लिए जीविकोपार्जन का साधन भी उपलब्ध कराती है संस्था। संस्था ने कई लड़कियों का विवाह भी कराया। सोपन्ना कहती हैं कि लल्लू बाबू के निधन के बाद मैं खुद को अकेला तो महसूस करती हूं, लेकिन इन बच्चों का साथ पाकर सार दुख भूल जाती हूं।

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