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लूट और हिंसा

नेता, अफसर और ठेकेदार के जिस भ्रष्ट लौहपाश में हमारी लोकशाही और अर्थव्यवस्था जकड़ी हुई है उसी का दुष्परिणाम है उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में पीडब्ल्यूडी के अधिशासी अभियंता मनोज गुप्ता की नृशंस हत्या। सरकार किसी भी पार्टी की बने यह लौहपाश उसका कमरबंद बन चुका है और यह लगभग तय है कि इसके बिना कोई सरकार चल नहीं सकती। लेकिन इस कमरबंद के साथ क्या लोकतंत्र ज्यादा दिन चल सकता है? साल भर पहले जब यूपी की जनता ने सपा को हरा कर बसपा को साफ बहुमत देकर सरकार सौंपी थी तो यही अर्थ निकाला गया कि वह अराजक हो चुकी कानून-व्यवस्था को सुधारना चाहती है और इसके लिए मायावती से बेहतर कोई नेता उसे नार नहीं आता। लेकिन औरैया की इस घटना ने राज्य के विपक्षी दलों को यह कहने का मौका दे दिया है कि बसपा के कार्यकाल में कानून और व्यवस्था में सुधार होने के विपरीत स्थितियां और बदतर हुई हैं। इससे पहले बसपा सांसद उमाकांत यादव, मंत्री यमुना प्रसाद निषाद, आनंद सेन और विधायक पंडित आपराधिक मामलों में गिरफ्तार हो ही चुके हैं। अब मुख्यमंत्री मायावती ने औरैया के विधायक शेखर तिवारी को भी गिरफ्तार करवा दिया है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि राज्य में अब स्थानीय स्तर के ठेके भी विभागीय मंत्री के निर्देश पर दिए जाते हैं, इसलिए कमीशन में विधायकों की हिस्सेदारी नहीं हो पा रही है। इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या की एक वजह यह भी हो सकती है। जो भी हो यह हत्या भ्रष्टाचार के उस लौहपाश का अंतर्विरोध दिखाई पड़ती है, जिसमें इस व्यवस्था को चलाने वाले एक दूसर का हाथ थामे हुए हैं। जो इस शिकंो में तालमेल नहीं बिठा पाता या इसके खिलाफ आवाज उठाता है, उसका हश्र या तो मनोज गुप्ता जसा होता है या इंडियन आयल के अधिकारी मंजुनाथ या बिहार में मार गए राजमार्ग के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की तरह। इसी वजह से देश के ढांचागत विकास की कई बड़ी परियोजनाएं या तो बीच रास्ते में अटक जाती हैं या खराब तरीके से निष्पादित होती हैं। बोहरा कमेटी की रपट और उदारीकरण इसी लौहपाश से निजात पाने की उम्मीद जताते थे। लेकिन विडंबना देखिए कि लूट और हिंसा के इसी शिकंो में फंसा बिहार आज मुक्त होता दिख रहा है, उसी में उत्तर प्रदेश जकड़ता दिख रहा है।

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  • Web Title: लूट और हिंसा