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सत्य जीता, सत्ता हारी

वे बेटे थे गुरु गोबिंद सिंह के। नाम था फतह सिंह और जोरावर सिंह। उम्र भले ही महज छह और आठ साल थी, लेकिन स्वाभिमान की रक्षा और धर्म की खातिर मर मिटने का उनका चाव और जज्बा आसमान जितना ऊंचा था। गंगू रसोइए के विश्वासघात से वे सरहिंद के नवाब वजीर खान की गिरफ्त में आ गये। नवाब ने उन पर धर्मपरिवर्तन के लिए कई डर दिए, कितने ही लालच दिखाये। उनकी मासूम उम्र का वास्ता देकर उन्हें अपने इरादे से विचलित करने का भी हरसंभव प्रयास किया। लेकिन वजीर खान का हर डर, हर लालच औंधे मुंह जमीन पर आन गिरा। देश और धर्म की खातिर जान की बाजी तक लगा देन की प्रेरणा उन्हें दादा गुरु तेग बहादुर से विरासत में मिली थी। सो, उन्होंने जिंदा दीवार में चिने जाना कबूल किया। इंच-इंच कर ज्यों-यों दीवार ऊंची होती गई, साहिबजादों के मुखमंडल की आभा तेज होती गई। इधर सत्ता के मद में सदा चूर रहने वाले नवाब वज़ीर खान, काज़ी दीवान सुच्चा नंद के चेहरे बुझे व उतरे हुए थे। साहिबजादों को किसी भी कीमत पर झुका लेन का ख्वाब पालने वालों की खुद की गर्दनें निराशा और हताशा में लटकी हुई थीं। इराद के पक्के दो मासूम बच्चों के हाथों उन्हें करारी शिकस्त खानी पड़ी थी। दीवार जब साहिबजादों की छाती तक आ गई तो नवाब और काज़ी ने आखिर कोशिश करते हुए कहा, ‘अब भी समय है। तुम्हारी जान बख्श दी जाएगी। यह दीवार तुरंत गिरा दी जाएगी।’ साहिबजादों ने जवाब दिया, ‘हम अपने धर्म का त्याग नहीं करेंगे। मौत का हमें कोई भय नहीं। हमें एक तो क्या, अगर करोड़ जिंदगियां भी मिलें तो धर्म के आगे वे सब तुच्छ हैं।’ देखते-देखते धर्म की बलि वेदी पर कुर्बान हो गए गुरु गोबिंद के जिगर के टुकड़े। कर गए नाम रोशन पिता और दादा का। शीश दे दिया पर मुख से आह तक नहीं निकली। सत्य जीता, सत्ता हारी।

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