DA Image
23 फरवरी, 2020|8:57|IST

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अमन की राह में शहीद होने का वक्त

मुंबई में 26 नवंबर को आतंकी हमले के बाद हम अमन की आवाजें सुनने को तरस गए हैं। हर तरफ युद्ध और बदले का शोर है। यह किसी दूसरी जगह और दूसरे समय की प्रतिध्वनियां हैं। अमेरिका में े बाद जो कुछ सुनाई पड़ रहा था वही आज भारत में सुनाई पड़ रहा है। लेकिन े बाद जनता और प्रमुख लोगों की तरफ से अमन, सद्बुद्धि और संयम के सशक्त स्वर सुनाई पड़े थे। धारा के विपरीत चलने के लिए कुछ लोगों को उस समय धकिया भी दिया गया था। फिर भी वे अपनी बात पर अड़े रहे। युद्ध के खिलाफ बोलने वालों में ज्यादातर महिलाएं थीं। अमेकिा की पुरस्कृत नारीवादी लेखिका राबिन मॉरगन ने आतंकी हमले कुछ दिनों बाद लिखा, ‘‘आवेदन शुरू हो गए हैं। पर वे न्याय के लिए हैं, इंतकाम के लिए नहीं । वे वाजिब प्रतिक्रिया की मांग तो कर रहे हैं पर प्रतिहिंसा के खिलाफ हैं। वे नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत होने के लिए हैं। वे निर्दोष अमेरिकी मुस्लिमों के हक के लिए हैं। वे अफगानिस्तान पर भोजन और दवाओं की बमबारी करने की मांग कर रहे हैं न कि बारूद और आग की।’’ उन्होंने लोगों से अपील की थी कि वे अखबारों और नेट का इस्तेमाल आतंकवाद की सही वजह बताने में करं। ‘‘ हमार संदेश जटिल और दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करते हैं, जबकि यह मौका एसा है जब लोग सरल, अल्पकालिक और सहूलियत वाला जवाब चाहते हैं। ’’ भारत में भी हम देख रहे हैं कि किस तरह मीडिया सहूलियत वाला जवाब थोप रहा है। जिन सवालों के जवाब पूर्व निर्धारित हैं उन पर आप को ‘हां’ या ‘न’ कहने पर मजबूर किया जाता है। आप से कहा जाता है कि पाकिस्तान से टकराव बढ़ाने को गलत क्यों मानते हैं इसका जवाब 30 सेकेंड में दीजिए। फिर जो आप कहेंगे उसे तोड़-मरोड़ दिया जाएगा और जब तक आप बात खत्म करंगे विषय बदल दिया जाएगा। नतीजतन हम आक्रामक अभिव्यक्ितयों की बाढ़ में डुबो दिए जाते हैं , जिसका जन्म अज्ञानता से होता है। हमें एसे लोगों के विचार जबर्दस्ती सुनाए जाते हैं जो उन मामलों से कभी बावस्ता ही नहीं हुए जिनसे बाहर भारतीय समाज को एसे वक्त में दो-चार होना पड़ता है। हमें बताया जा रहा है कि जनमानस आतंक से निपटने के लिए निर्णायक कार्रवाई के पक्ष में है। अगर कुछ लोग अलग बातें कर रहे हैं तो उन्हें या तो अनसुना कर दिया जाता है या फिर छांट दिया जाता है। इन गतिविधियों का ज्यादातर हिस्सा मीडिया की तरफ से सहमति निर्माण का प्रयास है। इसका बड़ा हिस्सा शहरी मध्य और उच्च वर्ग से संबंधित है। इसका प्रमाण पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में मिल गया है जिनमें आतंक के संदेश का इस्तेमाल करने वाली पार्टी की उम्मीद के मुताबिक उसकी लहर नदारद थी। ग्रामीण भारत में जो मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण उभर वह थे-सड़क, बिजली और पानी। आम आदमी और स्त्री के लिए सुरक्षा का यही मतलब होता है। उसके लिए सुरक्षा का मतलब पाकिस्तान से युद्ध नहीं होता, सैनिक शासन नहीं होता, सख्त आतंकविरोधी कानून नहीं होते, जिसकी आजकल हमार शहरों के लोग मांग कर रहे हैं। इसके अलावा आजकल बेहतर प्रशासन, बेहतर गुप्तचरी और पुलिस के लिए बेहतर प्रशिक्षण और उपकरणों की मांग उठ रही है। बहुत कम लोग पाकिस्तान से बेहतर संबंध की मांग कर रहे हैं। फिर भी भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ के नागरिक समाज की मदद से रिश्तों को सुधारने के लिए छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम उठाए गए थे उन्हें मुंबई के आतंकी हमलों ने धो दिया है। अमेरिका में े बाद कांग्रेस की सदस्य बारबरा ली की आवाज सबसे महत्वपूर्ण थी। कांग्रेस की प्रतिनिधि सभा में 14 सितंबर को उन्होंने कहा, ‘‘हम एक पारंपरिक युद्ध का सामना नहीं कर रहे हैं। इसलिए हमें पारंपरिक तरीके से जवाब नहीं देना चाहिए। मैं नहीं चाहती कि यह बवंडर नियंत्रण से बाहर हो जाए। यह संकट राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, जनसुरक्षा, गुप्तचरी, अर्थव्यवस्था और हत्या का है। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया भी उसी टक्कर की बहुआयामी होनी चाहिए। हमें नतीजों पर पहुंचने की जल्दी नहीं करनी चाहिए। बहुत सार निर्दोष लोग मर चुके हैं। हमारा देश शोक में डूबा हुआ है। अगर हम जवाबी हमला करते हैं तो महिलाएं, बच्चे और दूसर शांतिप्रिय लोग इस लड़ाई के शिकार होंगे। ’’ बारबरा ली की अपील पर बुश प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया और ो छेड़े गए आतंक के खिलाफ युद्ध की कीमत दुनिया को अदा करनी पड़ी। लेकिन वह कीमत आज तक अदा की जा रही है। सौभाग्य से हमारी सरकार ने अभी तक राजनय का रास्ता अपनाया हुआ है। लेकिन युद्ध का उन्माद पैदा करना कितना आसान है यह मुंबई हमलों के बाद के दिनों में जाहिर हो गया। लेकिन यही वक्त है जब भारत और पाकिस्तान के लोगों को यह बात याद दिलाई जानी चाहिए कि अमन की जगह बहुत महत्वपूर्ण है। ये आवाजें अक्सर डूबो दी जाती हैं पर वे हारती नहीं हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कई सालों के सैन्य शासन के बाद पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई एक सरकार है। वहां एक जीवंत मीडिया है जो सरकार के नियंत्रण के बिना काम करता है। वहां एक सक्रिय नागरिक समाज है जिसे भी हमार यहां की तरह लगभग उन्हीं मुद्दों से जूझना पड़ता है। जिनमें गरीबी, अशिक्षा, पर्यावरण क्षरण, नारी अधिकार, बाल मृत्यु, पानी, सफाई, शहरीकरण वगैरह शामिल हैं। पाकिस्तान को भी संकीर्ण हिंसा की घटनाओं से जूझना पड़ता है। वहां भी हाल के वर्षो में आतंकी हमले हुए हैं जिनमें तमाम बेगुनाह लोग मार गए हैं। मैं समझती हूं कि इस समय जब हर कोई पाकिस्तान के रक्त का प्यासा हो रहा है और यह मांग कर रहा है कि वह अपनी धरती पर सक्रिय आतंकियों पर कार्रवाई कर, यह सब एसी बातें हैं जिन्हं लोग सुनना नहीं पसंद करंगे। लेकिन यही वजह है कि हममें से जिसके पास अलग संवेदना है उसे अपनी रखनी चाहिए और उसे सुना जाना चाहिए। शायद हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। लेकिन राष्ट्रवाद और आक्रमण के इस ज्वार में अगर हम खामोश रहे तो अमन की जगह उन्हें सौंप देंगे जिन्हें नहीं मालूम कि युद्ध की कीमत क्या होती है। लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title: अमन की राह में शहीद होने का वक्त