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व्यावसायिक वाहनों को चार माह की जगह एक वर्ष का परमिट

व्यावसायिक वाहनों को चार माह की बजाय एक वर्ष का अस्थाई परमिट मिलेगा। परिवहन विभाग ने इस बाबत अपनी तैयारी शुरू कर दी है। रीजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (आरटीए) की बजाय जिला परिवहन कार्यालय (डीटीओ) से भी छोटे वाहनों का परमिट देने पर विचार हो रहा है। व्यावसायिक वाहनों का परिचालन परमिट लेकर ही हो, इसके लिए नियमों को कुछ आसान बनाया जायेगा।ड्ढr ड्ढr उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में व्यावसायिक वाहनों को चार माह की बजाय एक वर्ष का अस्थाई परमिट देने पर सहमति बन गयी है। इससे बस मालिक को भी बार-बार आवेदन लेकर आरटीए का चक्कर काटने से निजात मिल जायेगी। सूत्रों के अनुसार जिला परिवहन पदाधिकारियों को जिले अथवा दो शहरों के बीच चलने वाले वाहनों का परमिट जारी करने का अधिकार मिल सकता है। यही नहीं राज्य के भीतर कम भीड़ वाले मार्ग पर परमिटों की संख्या और समय सीमा के साथ काउंटर साइन के प्रावधान को भी समाप्त करने का भी विचार है। ऐसा होने पर मार्गो पर बसों की संख्या बढ़ेगी। 3000 से अधिक घोषणाओं पर अमल नहीं हो रहाड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। राजद के राष्ट्रीय महासचिव एवं प्रवक्ता श्याम रजक और प्रांतीय महासचिव निहोरा प्रसाद यादव ने कहा है कि नीतीश सरकार द्वारा तीन वर्षो में 3000 से अधिक घोषणाएं की गईं हैं पर उनपर अमल नहीं हो रहा है। बीपीएल सूची, इन्दिरा आवास, नरगा, वृद्धावस्था पेंशन, अन्त्योदय योजना समेत आम जनता को फायदा पहुंचाने वाली कई योजनाएं दम तोड़ रही हैं। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बिहार में हो रहे विकास एवं परिवर्तन रलमंत्री लालू प्रसाद को दिखाई नहीं दे रहा है। दरअसल नीतीश कुमार एवं लालू प्रसाद द्वारा विकास एवं परिवर्तन देखने का नजरिया अलग-अलग हैं। श्री कुमार जहां सामंतियों एवं शोषकों के चश्मा से हो रहे विकास को देख रहे हैं वहीं श्री प्रसाद निर्धनों, गरीबों और कोसी में पीड़ित के मन से विकास देख रहे हैं। सवाल यह है कि विकास किसके लिए हो रहा है? श्री रजक ने कहा कि राशन-किरासन लोगों को नहीं मिल रहा है। बिजली के अभाव में किसानों के करोड़ों रुपए के आलू कोल्ड स्टोरज में सड़ गये। डीजल के पटवन से किसानों की जेब के करोड़ों रुपए खर्च हो गये। उद्योगों का जाल बिछाने की घोषणा हवा में गुम हो गई। अल्पसंख्यकों, अति पिछड़ों एवं दलितों की योजनाएं भाषणबाजी में ही सिमट कर रह गईं।ं

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