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स्वाइन फ्लू : घातक रोग और नई मुसीबतें

पूरी दुनिया में दहशत का माहौल है। एच1एन1 वायरस से फैलने वाला ‘एन्फ्लुएन्जा ए’ बुखार खतरनाक बताया जा रहा है, क्योंकि यह तीन वायरस का घातक मेल है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली के दावे के अनुसार यह वायरस एवियन फ्लू, ह्यूमन फ्लू और स्वाइन फ्लू का सम्मिलित रूप है। ये वायरस आपस में मिलकर अनुवांशिक बदलाव की प्रक्रिया से नये और खतरनाक वायरस बन जाते हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महामारियों के शोध से जुड़ा अटलांटा का रोग नियंत्रण केन्द्र भी स्वाइन फ्लू के ‘एन्फ्लुएन्जा टाइप ए’ की पुष्टि कर चुका है। आमतौर पर यह वायरस सूअरों में फैलता है, लकिन इस बार इस वायरस का संक्रमण मनुष्य से मनुष्य में है। इस वायरस से बचाव के लिये जरूरी है कि संक्रमित व्यक्ित को पूरी जांच और निगरानी में रखा जाए तथा उन्हें राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय यात्राओं से रोका जाए। भारत में अभी तक किसी भी व्यक्ित में इस खास फ्लू के संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर में एच1एन1 संक्रमण के 787 मामलों की पुष्टि की है, लकिन ये सभी मामले मैक्िसको, स्पेन, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन सहित अन्य देशों में हैं। आशंका है कि न्यूयार्क में इस वायरस की चपेट में कोई एक हजार लोग हो सकते हैं। खतरे को इस आंकड़े से ज्यादा समझा जा सकता है कि सन् 1में फ्लू वायरस ने ही पूरी दुनिया को हिला दिया था और दुनिया भर में इससे चार करोड़ लोगों की मौतें हुई थीं। भारत में ही मरने वालों की संख्या 60 लाख से आस-पास थी। यह घातक फ्लू देश की सीमाएं लांघ कर कहीं भी पहुंचा सकता है, इसे नहीं भूलना चाहिये। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के तेज होन के साथ घातक रोगों के फैलन का सिलसिला भी तेज हुआ है। लगभग प्रत्येक वर्ष कोई न कोई घातक रोग दुनिया में कहीं न कहीं कहर बरपा रहा है और दहशत फैला रहा है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद जो लोग ज्यादा चर्चा में हैं उनमें सार्स, बर्ड फ्लू, एन्थ्रेक्स, इबोला, दिमागी बुखार, टंन रोटा, वेनेजुएला बुखार, साबिया-ब्रजिलियन बुखार, बेरोसिया विव्रिटा कॉलरा आदि बेहद खतरनाक रोग हैं। प्लेग जैसा घातक रोग कई वर्षो के बाद फिर सर उठा चुका है। इन रोगों के लक्षण और उपचार यों तो अलग-अलग हैं, लकिन एक बात सब में समान है, वह है इसका अन्तरराष्ट्रीय खौफ और प्रचार। 13 वर्ष पूर्व जब गुजरात में ‘प्लेग’ फैला था, तब जो अफरा-तफरी मची थी, उससे भारत का मैनचेस्टर कहा जाने वाला सूरत शहर बेरौनक हो गया था। करोड़ों का कारोबार चौपट हो गया था। सन् 2003 में जब सार्स फैला था, तब एशियाई देशों की अर्थव्यस्था चरमरा गई थी। बताते हैं कि इन देशों में अर्थव्यवस्था में 30 प्रतिशत की क्षति हुई थी। वर्ष 2004में ‘बर्ड फ्लू’ ने थाईलैंड की अर्थव्यवस्था को धो दिया था। वर्तमान जन स्वास्थ्य की चुनौतियों को यदि ध्यान से देखें तो नये घातक रोगों ने दुनिया के स्तर पर मुसीबतें खड़ी की हैं। मलेरिया, कालाजार, टी़ बी. जैसे पुराने लकिन जानलेवा रोग हालांकि आज भी लाखों लोगों के जान के दुश्मन हैं, लकिन इनकी चर्चा अब उतनी नहीं होती, जितनी आधुनिक वैश्विक महामारियों की होती है। भारत और अफ्रीका में आज भी मलेरिया और कालाजार से मरने वाले लोगों की संख्या लाखों में है। अब तो मलेरिया के जीवाणु दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता भी विकसित कर चुके हैं। यानी मलेरिया की दवा अब उतनी प्रभावी नहीं है, ऐसे में महामारियों के उपचार व रोकथाम की एक मुकम्मल देशी नीति बनाना बेहद जरूरी है, वरना आने वाले वर्षो में पुराने जानलेवा रोग ही फिर से शहर के मौत के रूप में उभरेंगे और बड़ी चुनौती खड़ी करेंगे। मौजूदा वायरस फ्लू की गम्भीरता को भी कम आंकना उचित नहीं होगा। केन्द्र सरकार ने इस खतरनाक ‘एन्फ्लुएन्जा ए’ वायरस को बेअसर करन की दवा ‘टैमीफ्रलू’ की निजी कम्पनियों द्वारा खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है। बहरहाल, महामारियों के मामले में उपचार से ज्यादा प्रभावी बचाव होता है, इसलिये आमलोगों को सलाह है कि वे अफवाहों से बचें, खांसी, छींके, बुखार, बदन दर्द के लक्षणों की योग्य चिकित्सकों से जांच कराएं। ‘फ्लू’ का सन्देह होने पर घबराने या दहशत में आन की बजाय लोगों व भीड़-भाड़ में न जाएं, यात्रा न करें तथा खान-पान व सही उपचार की मदद लें। जन स्वास्थ्य की सफलता व महामारियों की रोकथाम के लिये समय पर जानकारी और बचाव का त्वरित उपाय ही सबसे महत्वपूर्ण है। स्र्oष्ड्डrह्वठ्ठ२ ञ्चद्दद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक जन स्वास्थ्य कार्यकर्ता और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं।ं

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