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ठिठुरते हुए कट रही हैं छातापुर के लोगों की रातें

बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त अनवरत और चार महीने से जीवन संघर्ष की नित नई कहानी गढ़ रहे यत्र-तत्र शरणार्थी बने लोगों को कंपकंपाती ठंड ने बेदम कर दिया है। कोसी की उन्मुक्त धाराओं की चपेट में घरबार गंवा चुके सैकड़ों परिवार अभी भी यत्र-तत्र शरण लेकर अपने बच्चों के लिए दो जून की रोटी जुटा जुटाने के लिए संघर्षरत हैं।ड्ढr 1पंचायतों के सैकड़ों विस्थापित परिवारों की कहानी एक जसी है। चहुंओर पानी से घिर ऐसे लोगों को भयंकर बेरोगारी की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कंपकंपाती ठंड और सिहरन भरी हवा में इनकी मुश्किलें और बढ़ गयी हैं।ड्ढr ड्ढr सुरसर नदी से निकली नयी धारा में झखाड़गढ़ पंचायत से विस्थापित गृहविहीन दो दर्जन परिवार अभी भी कटहरा के समीप नहर बांध पर प्लास्टिक टांगकर रहने को विवश हैं। 55 वर्षीया रमकसिया देवी को अपनी जवान बेटी बीना की शादी की चिंता खाये जा रही है। गर्म कपड़ों के अभाव में एकमात्र साड़ी में लिपटी कहती है कि बड़े जतन से बेटी की शादी के लिए सामान जुटाये थे, घर सहित सब कुछ बह गया। अब कहां से शादी कर पाऊंगी। वृद्ध पिता अशर्फी सिंह की अनियमित मजदूरी पर परिवार की गाड़ी चल रही है। 18 वर्षीया बीना व 10 वर्षीया पिंकी सहित चार लोग बूढ़े हाथ के सहार किसी तरह दिन तो काट रहे हैं, लेकिन रात है कि कम्बल के बगैर आंखों में बीतती है। लोगों के रहमोकरम पर चार बच्चों को पाल रहे मूकबधिर मनोज कुमार सिंह की दशा का आकलन उसके निश्चल आंखों की भाषा से ही किया जा सकता है। झोपड़ी में रह रहे बिनोद सिंह, पहाड़ी सिंह, रामदेव सिंह सहित दो दर्जन परिवार बताते हैं कि सरकारी स्तर से प्राप्त 80 किलो चावल एवं 2250 रुपये तो कब का खत्म हो गया। अब तो न खाने को अन्न और न ही गर्म कपड़े। पहले तो नेताजी हाकिम लोगों के साथ आते भी थे अब तो कोई झांकने भी नही आता। विगत चार माह से अभावग्रस्त जीवन बसर कर रहे ऐसे परिवारों की संख्या कंपकंपाती ठंड में कब सिकुड़ने लगे कहना मुश्किल है।

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  • Web Title: ठिठुरते हुए कट रही हैं छातापुर के लोगों की रातें