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आर्थिक मंदी से उम्मीदें

व्यापारिक मंदी से कभी-कभी लाभ भी होता है। हिन्दुस्तान के मीडिया सेक्टर में इसका अनुभव हमें आनेवाले साल में मिलना चाहिए। भगवान कर कि टीवी चैनलों की बढ़ौती पर रोक लगे, दिल्ली में नए अखबारों के उद्घाटन न हों (इस वक्त, तकरीबन 30 दैनिक अखबार इस शहर से निकलते हैं), और पत्रकारिता के व्यवसाय में कुछ अक्लमंदी वापस आ जाए। मानती हूं कि लोकतंत्र के लिए आजाद मीडिया फायदेमंद है। टीवी चैनलों की संख्या बढ़ रही है क्योंकि अर्थव्यवस्था में तरक्की हो रही है और विज्ञापनों की तादाद में बढ़ोतरी आ रही है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इससे हमार लोकतंत्र को कोई फायदा मिलेगा। वाणिज्यिक टीवी चैनलों की एक सीमा भी होती है। अपनी दर्शक संख्या बढा़ने के चक्कर में वे खबर की खोज और परखने में कम पैसे और लोग लगाते हैं, और सनसनी फैलाने वाली खबर को दोहराकर अपना एयर टाइम भर देते हैं। पिछले दो साल में टीवी चैनल्स कई गुना बढ़े हैं क्योंकि हिन्दुस्तानी और विदेशी निवेशक मीडिया सेक्टर में अपने पैसे डाल रहे थे। आखिर, हिन्दुस्तान में विज्ञापन और शेयर बाजार जिस गति से बढ़ रहे थे, वैसी बढ़त कम देशों में दिखाई दे रही थी। पर दुनिया भर में व्यापारिक मंदी आने से ऐसी वृद्धि थम जाएगी। और जो चैनल शुरू हो चुके हैं उनको सोचना है कि आखिर वे व्यवसाय में क्यों हैं। क्या वे ऐसी कोई प्रोग्रामिंग कर रहे हैं जो कोई और नहीं कर रहा है? या जसे वे ज्यादा अच्छे ढंग से कर पाएंगे? टेलीविजन और अखबार की संख्या बढ़ने से पत्रकारिता पर असर पड़ा है। कुछ लोग बार-बार नौकरी बदल कर अपने वेतन को दो या तीन गुना बढ़ाने में कामयाब रहे हैं। पर उनके इस वेतन से पूरी प्रोफेशनल वैल्यू उनके नियोक्ता को नहीं मिल रही है। बाजार में पत्रकारों की मांग बढ़ जाने के कारण छोटी उम्र में ही लोग हर साल प्रमोशन पाने लगे हैं। हालांकि इन लोगों की कुल जमा ट्रेनिंग बहुत कम है। जहां कुछ लोगों के वेतन बहुत ज्यादा हैं, उनके काम में इसके मुकाबले गुणवत्ता दिखाई नहीं देती। किसी भी अखबार के रिपोर्टर को टेलीफोन पर बयान दीजिए, और देखिए कि दूसर दिन जो निकलता है उसका आपके कहे हुए शब्दों से कितना संबंध है। कम अनुभवी टीवी रिपोर्टर को खबर के साथ अपनी धारणाएं मिलाना सिखाया जाता है। क्योंकि वह अपने बॉस को टीवी पर शेर बनते हुए देखता है, नेताओं के पेशे पर कीचड़ उछालते हुए और आतंक के बदले जंग की बात करते हुए। सन 2008 में टीवी की खबरों का स्तर काफी नीचे गिरा। आरुषि-हेमराज डबल मर्डर के मामले में और मुंबई में आतंक की रिपोर्टिग करने में ऐसे लगा कि चैनलों के रिपोर्टर और संपादक अपने विवेक को खो बैठे हैं। इसलिए जब हम आईएनएक्स टीवी ग्रुप की मुश्किलों के बार सुनते हैं ज्यादा अफसोस महसूस नहीं होता है। क्या जरूरत है और एक चैनलों की जब बाकी सब वही चीज पहले से ही दे रहे हैं? अगर 200में चैनल कम हुए तो यह अच्छी बात होगी। इतने न्यूज चैनल, इतने बिजनेस चैनल, इतने बिजनेस अखबार किसी और देश में नहीं हैं। सेटेलाइट के जरिए 372 टीवी चैनल आ चुके हैं। मगर यहां अपने आप को नियमित करने के तरीके (सेल्फ रगुलेशन) और देशों से इतने कम हैं कि एक हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। अर्थव्यवस्था की मंदी की वजह से कई अखबार अपने पेज कम करने लगे हैं। कितने पढ़ने वालों को यह बात महसूस हुई? इतने पेज, और इतने सप्लीमेंट कि जरूरत शायद नहीं है, अगर कुछ कम हो जाएं, तो अखबारी कागज की किल्लत भी कम होगी, और दाम गिरंगे। तो सोचिए, क्या यह मंदी का बुरा असर हुआ, या अच्छा? इस साल और पिछले साल में खबरों का बाजारमुखी विस्तार हुआ है। सिर्फ बाजार पर ही ध्यान देने के कारण से रिपोर्टिग के क्षेत्र में बहुत सी कमियां रह गई हैं। आपको आमिर खान और शाहरुख खान पर दस विशेषज्ञ मिल जाएंगे, सचिन तेंदुलकर पर बीस, कृषि और शिक्षा पर मुश्किल से तीन या चार। टीवी के विस्तार के कारण सैकड़ों टीवी ट्रेनिंग की दुकानें खुल चुकी हैं। हरक लड़का या लड़की टीवी एंकर बनना चाहता है। जब मंदी की वजह से मीडिया हाउस ध्यान से नियुक्ित करने लगेंगे, इस पेशे को फायदा पहुंचेगा। जब खर्च करने के लिए मीडिया बिजनेस में पैसे कम होंगे तो शायद हमारी मीडिया कंपनियां अपने संपादकीय लक्ष्य पर, अपने तौर-तरीकों की नैतिकता पर और अपनी व्यावसायिक रणनीति के मामले में कुछ ज्यादा गंभीर होंगे, और इसका नतीजा बुरा नहीं हो सकता है।ं

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