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अमिताभ से बनती है भारत की अलग छवि

अमिताभ से बनती है भारत की अलग छवि

अमिताभ बच्चन वह नाम है जिनकी वजह से विश्व में भारत की एक अलग छवि बनती है, जो भारत के ताजमहल, कढ़ी और कामसूत्र से कहीं ज्यादा सशक्त है।
   
यह कहना है भारतीय सिनेमा और संस्कृति की विशेषज्ञ रैशेल डवायर का। लंदन के ओरिएंटल और अफ्रीकी अध्ययन संस्थान (एसओएएस) की प्रोफेसर डवायर ने वर्ष 2011 के फोर्ड व्याख्यान में कहा कि बच्चन नैतिक भावना के महान संचारक हैं, जिनकी फिल्मों के प्रशंसक विश्व भर में मौजूद हैं।
   
बच्चन अलफ्रेड फोर्ड द्वारा समर्थित ऑक्सफोर्ड सेंटर फॉर हिंदू स्टडीज (ओसीएचएस) के आमंत्रण पर मंगलवार को ऑक्सफोर्ड के दौरे पहुंचे थे। यहां उन्होंने अमिताभ बच्चन 'इमोशन एंड दी स्टार' इन हिंदी फिल्म नाम के डवायर के व्याख्यान में भाग लिया।
   
डवायर ने यह कहा कि बच्चन हिन्दी सिनेमा को बॉलीवुड का नाम दिए जाने से काफी असहज महसूस करते हैं, लेकिन अपने व्याख्यान के दौरान कई बार उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल किया। इस मौके को ऐतिहासिक बनाने के लिए पहली बार यहां बच्चन की कई फिल्मों के संवाद और गीतों को सुनाया गया। इनमें 'कभी-कभी' और 'कजरारे' शामिल हैं।

इस मौके पर बच्चन ने कहा कि हम 1950 और 1960 के दशकों से काफी आगे बढ़ चुके हैं जब माता-पिता भारतीय फिल्मों को स्तरीय नहीं समझते थे। उन्होंने कहा कि जब भी कोई देश आर्थिक रूप से उन्नति करता है, तब उसकी संस्कति, संगीत और कपड़ों आदि का महत्व बढ़ जाता है।

पश्चिम भारत की फिल्मों को निराशाजनक नजरिए से देखता था, लेकिन अब वही बातें अनूठी लगने लगी हैं जिनकी पहले आलोचना होती थी। यह विदेशों में भारतीय सिनेमा को मिली पहचान का प्रतीक है। बच्चन ने कहा कि भारतीय सिनेमा हॉल उस एकता और अखंडता के प्रतीक हैं, जो विश्व के अन्य भागों से तेजी से खत्म हो रही है।

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