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स्वीटनर से बचके ही रहना

आर्टिफिशियल स्वीटनर जीवन की मिठास को कम करते जा रहे हैं। डायबिटीज से बचने और खूबसूरत दिखने की ललक में लोग चीनी की जगह इनका इस्तेमाल करते हैं, जो स्लिम एन ट्रिम तो बनाते नहीं, पर बीमारियों की गोद में जरूर बिठा देते हैं। बता रहे हैं मज्कूर आलम

बेटे को नौकरी मिल गई, मुंह मीठा कराओ भाई.. या फिर बिटिया की शादी पक्की हो गई.. वाह तब तो मुंह जरूर मीठा होना चाहिए- जैसे जुमले हमारी तहजीब का हिस्सा हैं। कोई भी मुबारक मौका बिना मीठे के पूरा नहीं होता, तभी तो कहते हैं- कुछ मीठा हो जाए।

लेकिन यह सब जितना सच है, उतना ही सच यह भी है कि फिट रहने की राह में मीठा ही ज्यादा बाधक है, क्योंकि मीठे में ज्यादा कैलोरी होती है। इसीलिए फास्ट लाइफ की स्पीड को बरकरार रखने के लिए फास्टफूड की तरह सामने आया- आर्टिफिशियल स्वीटनर। इससे थकाऊ और वक्त पकाऊ एक्सरसाइज से छुट्टी भी मिल जाती है और अतिरिक्त कैलोरी का दबाव भी नहीं रहता।

आर्टिफिशियल स्वीटनर के बारे में कुछ बातें आम तौर पर लोगों के जेहन में बैठी हुई हैं कि इसमें न फैट होता है और न ही कैलोरी। इसलिए लोगों ने चीनी के विकल्प के रूप में इसे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इससे उनका जायका भी बना रहता है और न डायबिटीज होने का डर रहता, न ही मोटे होने का। लेकिन यह सच नहीं है। सच यह है कि इसमें भी कैलोरी और फैट होता है।

बढ़ता क्रेज

आर्टिफिशियल स्वीटनर का दिन ब दिन क्रेज बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि इसका चाय-कॉफी से लेकर मिठाई, सॉफ्ट ड्रिंक्स, च्यूइंगम आदि में मिठास लाने के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। मार्केट में नित नये आने वाले शुगर फ्री प्रोडक्ट आ रहे हैं। अब कॉफी शॉप हो या रेस्टोरेंट्स, हर जगह आर्टिफिशियल स्वीटनर से बने डिशेज मौजूद हैं।

क्या है इस बढ़ती मांग का राज

डाइटीशियन अपर्णा सिंह कहती हैं- इसकी बढ़ती मांग की सबसे बड़ी वजह है लोगों में अब अपनी फिटनेस को लेकर आई जागरूकता और जीरो फिगर की चाहत। मनोवैज्ञानिक बिंदा सिंह कहती हैं कि फिगर मेंटेन रखने की चाहत रखने वाले लोग अपनी पसंदीदा चीजों को खाने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं। लेकिन साथ ही मन अपराधबोध से भी भर जाता है। टेंशन में न कोई काम कर पाते हैं, न ही सो पाते हैं। यह परेशानी कई डायबिटिक लोगों को भी होती है, इसलिए लोग आर्टिफिशियल स्वीटनर लेने लगते हैं।

रिसर्च की नजर में है यह मीठा जहर

सच वह नहीं, जो मार्केट में प्रचलित है। सच यह है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर न मोटापा कम करता है और न ही किसी दूसरी तरह से मददगार है। न्यूरो साइंस के मशहूर वैज्ञानिक डॉ. जॉन ओनली ने सबसे पहले 1970 में इसके नुकसान के बारे में बताया। उन्होंने पाया कि इससे दिमाग की तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचता है।

1996 में इसका कनेक्शन ब्रेन टय़ूमर से भी ढूंढ़ निकाला गया। नार्थ इस्टर्न ओहियो यूनिवर्सिटीज कॉलेज ऑफ मेडिसिन के साइकियाट्री के प्रोफेसर और चेयरमैन डॉ. राल्फ वॉटसन के अध्ययन में यह सामने आया कि आर्टिफिशियल स्वीटनर से सिरदर्द, याददाश्त की कमी, अचानक चक्कर आकर गिर पड़ना, कोमा और कैंसर हो सकता है। इसके अलावा भी यह कई शारीरिक और मनोरोगों का कारण बन सकता है, जिसमें अल्जाइमर, क्रॉनिक थकान, अवसाद आदि प्रमुख हैं। हालिया शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं।

कुछ मामलों में इसके लगातार इस्तेमाल से एडिक्शन की समस्या से भी दो चार होना पड़ता है। आर्टिफिशियल स्वीटनर वाले ड्रिंक्स एवं खाद्य पदार्थ लेने से टेस्ट बड्स में चेंज आ जाता है, जिससे इन्हें लेने की उत्कट इच्छा होती है। बेचैनी महसूस होती है। इसे ले लेने के बाद अच्छा महसूस होता है, क्योंकि ये दिमाग के उन सेंटर्स को डेवलप कर देते हैं, जो इनके लिए उत्तरदायी हैं।

छलावा है आर्टिफिशियल स्वीटनर

डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. नवीन कुमार के अनुसार आर्टिफिशियल स्वीटनर को लोग थुलथुलेपन से छुटकारा और शुगर लेबल न बढ़े, इसके लिए लेते हैं। लेकिन ऐसा समझना भारी भूल है। यह छलावा मात्र है। इसेलॉन्ग टर्म तक लेने से उल्टा मोटापा बढ़ता है, क्योंकि इसमें कैलोरी भी होती है और फैट भी होता है। इसे देखना है तो एक शुगर फ्री चकली लेकर इसे तोड़ें, देखेंगे कि हाथ में ऑयल लग गया।

क्या करें

डॉ. नवीन कुमार के अनुसार, सबसे बेहतर है कि अपने ऊपर संयम रखें और उतना ही मीठा खाएं, जो नुकसान न करे और जम कर एक्सरसाइज करें, फल लें, मेवा खाएं। एक्सरसाइज से डायबिटीज के पेशेंट को भी राहत मिलती है और वेट भी कंट्रोल में रहता है।

हड्डियां होती हैं कमजोर

हड्डियों के लिए फ्रुक्टोज जरूरी है, जो चीनी से मिलता है। आर्टिफिशियल स्वीटनर में यह नहीं होता। इसलिए इसे लेने से हड्डियां व कार्टिलेज कमजोर होते हैं। इस वजह से आर्थराइटिस व ऑस्टियोपोरोसिस हो सकती है। जोड़ों का साइनिंग लेयर खत्म हो जाता है, जिससे  जॉइंट्स में रफनेस आ जाती है। हड्डियों में सूजन, खुरदुरापन, वॉटर कलेक्शन आदि बीमारियां हो सकती हैं। हड्डी व खून की बनावट में बदलाव आ सकता है, जिससे खून या हड्डियों का लसलसापन कम या ज्यादा हो सकता है। हड्डियों में भुरभुरापन आ सकता है। सबसे खतरनाक बात तो यह कि इसका हड्डियों पर टॉक्सिक इफेक्ट भी देखा गया है। डॉ. अर्जुन सिंह, आर्थोपेडिसियन, एचओडी, पीएमसीएच, पटना

आर्टिफिशियल स्वीटनर के खिलाफ हुए मुकदमे

सबसे पहले 2004 में कैलिफोर्निया की तीन अदालतों - सास्ता, सोनोमा और बूटे काउंटी में अलग-अलग 12 कंपनियों के खिलाफ मुकदमे दायर किये गए। इसमें कोक, पेप्सिको वालमार्ट, वेथ जैसी मशहूर कंपनियां भी शामिल थीं। इन कंपनियों पर फ्रॉड का आरोप था। आरोप था कि ये कंपनियां आर्टिफिशियल स्वीटनर स्पार्टेम का इस्तेमाल करती हैं, जो इनसान के लिए धीमा जहर है। तब से लेकर अब तक 1200 से भी ज्यादा कंपनियों पर आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल करने और उन प्रोडक्ट्स से लोगों पर हुए नुकसान की वजह से मुकदमे दायर हो चुके हैं।

सौंदर्य का दुश्मन

सुंदर दिखने का अर्थ सिर्फ लिन एंड थीन काया नहीं, इसके लिए खूबसूरत, चमकदार और बेदाग स्किन भी जरूरी है। लड़की गोरी हो या काली, अगर उसकी स्किन चमकदार, बेदाग, चिकनी, लचीली, स्वस्थ जानदार है तो न सिर्फ वह खूबसूरत नजर आएगी, बल्कि कमसिन भी दिखेगी। लेकिन इसे ज्यादा या लंबे समय तक लेने से स्किन प्रॉब्लम्स होने लगती हैं। सबसे बड़ी समस्या एलर्जी की होती है। स्किन पिगमेंटेशन, इरप्शन, रैशेज आदि की समस्याएं होने लगती है। इससे उम्र ज्यादा दिखने लगती है। स्किन खुरदरी हो जाती है। उसकी चमक गायब हो जाती है।
स्मृति रंगा
स्किन थेरेपिस्ट एंड टेक्निकल एडवाइजर, लॉक्स सैलून,
शिप्रा मॉल, गाजियाबाद

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