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चाय उत्पादन में भले ही असम और दार्जिलिंग का दबदबा हो पर अपने उत्तराखण्ड में उगायी जा रही जैविक चाय (आर्थोडॉक चाय) दुनिया की सबसे महंगी चाय में शामिल है। दक्षिण कोरिया इस चाय को 9700 रुपए प्रति किलो के हिसाब से आयात कर रहा है।

अमेरिका और नीदरलैंड में भी इस चाय की बड़ी डिमांड है। चाय बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि, दुनिया के चाय बाजार में उत्तराखण्ड की चाय की लोकप्रियता को देखते हुए राज्य में चाय बागानों का क्षेत्रफल बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखण्ड में चाय उत्पादन अंग्रेजी शासनकाल में शुरू किया गया था।

एक समय में बेरीनाग-झलतोला, पौड़ी, देहरादून की चाय का दुनिया में डंका बजता था। पर आजादी के बाद बागान वीरान पड़ गए। नब्बे के दशक में चाय पर फिर से ध्यान दिया गया। वर्तमान में कौसानी, गरुड़, कन्धार, ग्वालदम, गैरसैण, कालीमाटी, नौटी, धरमघर, काणाताल, भवाली, घोड़ाखल, चंपावत, छीड़ापानी में करीब एक हजार हेक्टेयर क्षेत्र में चाय की खेती की जा रही है।

कौसानी में निजी क्षेत्र की एक फैक्ट्री तथा घोड़ा खाल में टीबोर्ड की प्रोसेसिंग यूनिट संचालित हो रही हैं। चंपावत में भी फैक्ट्री का काम शुरू हो रहा है। आर्थोडाक चाय में क्या है खासजैविक चाय बागान घोड़ाखाल के प्रबंधक नवीन चन्द्र पाण्डे बताते हैं कि, 1200 मीटर से लेकर 2000 मीटर की ऊंचाई पर उगायी जाने वाली आर्थोडाक चाय सीधे पत्ती और कली से तैयार की जाती है।

चाय के पौधे पर जब दो कोमल पत्तियां आती हैं, उसे कली सहित तोड़ दिया जाता है और 24 घंटे के भीतर प्रोसेस कर पैक कर दिया जाता है। उत्तराखण्ड में 1800 से 2000 की ऊँचाई पर हिमालयन फेस वाले क्षेत्रों में उगायी जाने वाली चाय सवरेत्तम मानी जाती है।

इस साल पैदा हुई डेढ़ लाख किलो चाय

उत्तराखण्ड में इस साल 75 हजार किलो सामान्य और 70 हजार किलो जैविक ग्रीन लीफ का उत्पादन हुआ है। ग्रीन लीफ का 30 फीसदी निर्यात किया जा रहा है। जिलाधिकारी एवं उत्तराचंल टी बोर्ड के निदेशक डीएस गब्र्याल का कहना है कि, चाय का निर्यात नीदरलैण्ड, दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका को किया जा रहा है।

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  • Web Title:उत्तराखण्ड की चाय के कोरियन हुए दीवाने