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काबुल में निर्णायक भूमिका निभाइए

अमेरिकी स्पेशल फोर्स द्वारा ओसामा बिन लादेन के सफाए को इस क्षेत्र के इतिहास का बड़ा मोड़ बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस समय काबुल पहुंचे, जब पूरी दुनिया की दिलचस्पी यह जानने में है कि अफगानिस्तान में भारत की भावी भूमिका क्या होगी। मनमोहन सिंह लगभग छह साल के बाद अफगानिस्तान गए और 50 करोड़ डॉलर की मदद की घोषणा की। यह मदद उस डेढ़ अरब डॉलर की धनराशि के अलावा होगी, जो भारत इस समय अफगानिस्तान को कई रूपों में दे रहा है। भारत और अफगानिस्तान में कई मसलों पर रणनीतिक सहयोग की सहमति बनी है। प्रधानमंत्री को यह सम्मान भी दिया गया कि वह अफगानिस्तानी संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करें।

यह अफगान-पाक राजनीति का नया दौर है, जब भारत इस क्षेत्र के बदलते सामरिक हालात को देखते हुए अपने राजनैतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। बदलते हालात को ध्यान में रखना इसलिए भी जरूरी है कि अभी कुछ दिनों पहले तक पाकिस्तान हामिद करजई को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश कर रहा था कि वह अमेरिका का साथ छोड़ें और पाकिस्तान व चीन के साथ गठजोड़ करके तालिबान से समझौता करने के साथ अफगानिस्तानी अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करें। अभी पिछले ही महीने इस्लामाबाद और काबुल ने दो साझा आयोग बनाए थे, जिनका मकसद तालिबान से सुलह-सफाई करना था। इस समझौते ने पाकिस्तानी फौज को अफगान समस्या में एक औपचारिक भूमिका दे दी थी।

भारत ने अफगान जनता के दिल और दिमाग को भले ही जीत रखे हों, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसके विकल्प वहां सीमित हो गए थे। और इसमें गलती पूरी तरह से नई दिल्ली की ही थी। अमेरिकी फौज जबसे अफगानिस्तान में घुसी है, भारत अफगान-पाक मसले पर अपना पक्ष लोगों को समझाने में नाकाम रहा। इस वजह से पाकिस्तान पर पश्चिम की निर्भरता बढ़ गई। अफगानिस्तान को लेकर भारत में दो तरह की सोच है। कुछ लोग यह मानते हैं कि हाल के दिनों में भारत की नीति को कई झटके जरूर लगे हैं, लेकिन उसे अब भी अफगान-पाक क्षेत्र में अपने हितों के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना चाहिए। वे मानते हैं कि भारत और ओबामा प्रशासन में इस मसले पर एक बड़ी सहमति है कि अफगानिस्तान की समस्याओं की जड़ पाकिस्तान में है, और दुनिया को एकजुट होकर यह कोशिश करनी चाहिए कि इस्लामाबाद अपनी राजनैतिक बदनीयती को छोड़ दे। अब अमेरिका यह कहने लगा है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच का सीमाहीन इलाका विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उसका तर्क है कि इस्लामाबाद समस्या की जड़ में है, उसके समाधान में नहीं। साथ ही अमेरिका ने भारत से यह आग्रह भी किया है कि वह अफगान-पाक क्षेत्र में शांति लाने के लिए दुनिया के साथ सहयोग करे। यह अमेरिका की इस इलाके के लिए अब तक की नीति में बड़ा बदलाव है। इसलिए अब भारत को आतंकवाद के खिलाफ रणनीति बनाने में अमेरिका का सहयोग करना चाहिए।

दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जो इस मामले में भारत की अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंतित हैं। इन लोगों का कहना है कि अफ-पाक क्षेत्र में भारत और अमेरिका के हितों में काफी अंतर है। ओबामा प्रशासन ने अपनी अफ-पाक नीति बनाते समय भारत के हितों को काफी व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया है। एक तो पाकिस्तान की नाराजगी के डर से उसने भारत को अफगानिस्तान में कोई बड़ी भूमिका निभाने से वंचित कर दिया और दूसरे वह पाकिस्तान को भी यह समझाने में नाकाम रहा कि वह भारत की चिंताओं को गंभीरता से ले। अपनी जीत से उत्साहित होकर पश्चिमी देश अब सोचने लग पड़े हैं कि वे पाकिस्तान की मदद से ‘अच्छे’ तालिबान से गठजोड़ कर सकते हैं। इसका अर्थ होगा कि नई रणनीति में पाकिस्तान की केंद्रीय भूमिका होगी। यह भूमिका भारत के लिए नई परेशानी खड़ी करेगी।

पश्चिमी देश एक ऐसी रणनीति बना रहे हैं, जो न सिर्फ अफगानिस्तान में पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण भूमिका दे देगी, बल्कि इस क्षेत्र के संतुलन को भी बिगाड़ देगी। जब तक अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ नहीं होता, अमेरिका की इस क्षेत्र के असंतुलन में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन भारत की है। तालिबान अच्छे हों या बुरे, वे मूल रूप से भारत के खिलाफ ही होंगे। अगर अफगानिस्तान में एक आधुनिक राजसत्ता कायम करने और पाकिस्तान को उदार बनाने का लक्ष्य छोड़ दिया जाता है, तो निश्चित रूप से इसका असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा।

अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन जैसे ही कम किया है, भारत का अफगानिस्तान पर प्रभाव बढ़ गया है। अफगानिस्तान में भारत एक बड़ा आर्थिक खिलाड़ी बनकर उभरा है और वह विभिन्न मोर्चो पर अफगान सरकार की क्षमताओं को बढ़ाने में भी जुटा है। लेकिन वहां पर अपनी भूमिका पर जोर न देकर और अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल न करने की वजह से जब भी वहां हालात बदलते हैं और भारत व अमेरिका के हितों में अंतर आता है, तो भारत वहां अप्रासंगिक हो जाता है। ओबामा प्रशासन अब अफगानिस्तान से निकलना चाहता है और उसने भारत को संकेत दे दिया है कि वह बाद के हालात के लिए वहां सक्रिय हो सकता है। भारत अफगानिस्तान में अपने सहयोगियों का विश्वास खो चुका है। अगर भारत अपने हितों के लिए खड़ा नहीं होता, तो कोई उसके साथ नहीं जुड़ना चाहेगा। बुश प्रशासन के दौर में अफगानिस्तान में भारत की स्थिति काफी मजबूत थी, लेकिन ओबामा प्रशासन की पाकिस्तान पर निर्भरता बढ़ते ही वह स्थिति कमजोर हो गई।

दूसरी तरफ, पाकिस्तान का कमजोर लोकतंत्र और ताकतवर फौज अफगानिस्तान की समस्या पर काबू पाने में इस कदर नाकाम रहे हैं कि पाकिस्तान की राजसत्ता पर ही खतरा मंडराने लगा है। उसकी भारत केंद्रित नीति के चलते भारत से कोई समझौता होने से रहा। कियानी काबुल में अपना बोलबाला चाहते हैं। ऐसी स्थिति, जिसमें अफगानिस्तान उसकी मुट्ठी में रहे। वैसे ही, जैसे 1992 से 2001 तक था।

ओसामा बिन लादेन की मौत ने भारत को एक बार फिर मौका दिया है। भारत को यह मौका गंवाना नहीं चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की काबुल यात्रा यही बताती है कि नई दिल्ली ने इसकी संभावनाओं को आंकना शुरू कर दिया है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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