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पढ़े-लिखे लोग ही करेंगे गांव का विकास

सब कहते हैं कि गांवों का विकास नहीं हो रहा है। इसके लिए सरकारी तंत्र को जिम्मेदार माना जाता है। यह सच तो है, लेकिन इसका समाधान क्या है? क्या यूं ही सब चलता रहेगा? नहीं, हमें नए रास्ते निकालने चाहिए। करीब एक साल पहले जब मैंने सोडा गांव के सरपंच की कमान संभाली थी, तो वहां पर कुछ विकास नहीं हुआ था। कोशिश की, तो आज हो रहा है। ऐसा नहीं कि हमारे आने से कोई नई योजना बन गई। हमने तो उन्हीं सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित कराया, जो पहले से चल रही थीं। दरअसल, सही जगह सही तरीके से आवाज उठाने की जरूरत है। इसलिए सबसे पहले जरूरी है कि पढ़े-लिखे लोग गांवों में काम करने के लिए आगे आएं।

हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि पढ़े-लिखे लोग गांव छोड़ देते हैं और शहर में बसने के बाद वे गांव की बुनियादी सुविधाओं की कमी को देखकर वापस नहीं आते। इसलिए गांव आज भी पिछड़े हैं। दूसरे, गांवों के विकास के लिए सरकार की योजनाएं कम नहीं हैं। बजट की भी कमी नहीं है। जरूरत है, तो उसके सही इस्तेमाल की। हां, सरकार को यह नियम जरूरत बना देना चाहिए कि किसी योजना को मंजूरी देने में वह अधिकतम कितना समय लगाएगी और किसी योजना को लागू करने में वह कितना समय लगाएगी। इसका सख्ती से पालन भी होना चाहिए। कुछ बुनियादी दिक्कतें भी हैं, जिनके बारे में सोचना होगा। मेरे गांव में सौ एकड़ का एक पुराना तालाब है, लेकिन इसमें गाद जमी हुई है। हमने इसकी सफाई का प्रोजेक्ट सरकार को दिया है। 20 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान है। सरकार तैयार भी है, लेकिन गांवों में जो पैसा खर्च होता है, उसमें मशीनों का इस्तेमाल नहीं होना है तथा श्रमिकों से ही कार्य होना चाहिए। इसलिए यह योजना पास नहीं हुई। विभिन्न योजनाओं व चंदे से 20 लाख जुटाकर हमने तालाब का दस एकड़ हिस्सा साफ करा दिया है। यदि तालाब पूरा साफ हो जाए, तो बारिश में जमा होने वाले पानी से साल भर का इंतजाम हो सकता है। सरकारी योजनाओं में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ रही है। लेकिन शहरों में सुविधाएं बढ़ाने तक ही यह सीमित है। गांवों के विकास के लिए विशेष रूप से पीपीपी मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। गांवों में सैकड़ों किलोमीटर तक कोई अस्पताल नहीं होता और ऑपरेशन की सुविधा नहीं होती। यदि सरकार निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी में गांव में एक अस्पताल खोलती है और इसमें इलाज कराने पर ग्रामीणों को कुछ भुगतान भी करना पड़ता है, तो बुरा क्या है। इससे एक तो इलाज के अभाव में होने वाली मौतें कम होंगी। दूसरे, यदि लोग इलाज के लिए शहर जाते हैं, और वहां मुफ्त इलाज मिल भी जाए, तब भी आने-जाने व ठहरने में ही उनकी काफी रकम खर्च हो जाती है। ऐसा ही सड़कों, और विशेषज्ञता वाले कॉलेजों आदि के निर्माण में भी हो।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

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