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जब ब्लॉगस्पॉट बैठ गया

मात्र 10-12 घंटों के लिए गूगल का ब्लॉगस्पॉट क्या बैठा, हर तरफ हाहाकार मच गया। छपास पीड़ा के रोगी ऐसे तड़पे, जैसे किसी हृदय रोगी से ऑक्सीजन मास्क खींच लिया गया हो। जिसे देखा, वह हैरान नजर आया। एक सक्रिय ब्लॉगर होने के नाते चूंकि हमारी हालत भी वही थी, सो गाते-गाते फेसबुक, ट्विटर, बज्ज, ऑर्कुट पर डोलते रहे:
सीने में जलन, आंखों में तूफान-सा क्यूं है।
इस शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यूं है।

सन 1780 के आस-पास शाह हातिम के जमाने में भी लगता है ब्लॉगर्स जैसा कोई टंटा रहा होगा। और कभी ऐसे ही बैठ गया होगा, जैसे कि आज ब्लॉगर बैठा। तब के हैरान-परेशान लोगों की हालत देखकर ही शाह हातिम ने लिखा होगा:
तुम कि बैठे हुए इक आफत हो
उठ खड़े हो तो क्या कयामत हो! 
सब आदत की बात होती है। कोई भी आदत शुरू में शौक या मजबूरी से ही एंट्री लेती है और बाद में लत बन जाती है। अच्छी या बुरी, दोनों ही बातें अगर लत बन जाएं और फिर न उपलब्ध हों, तो तकलीफदेह हो चलती हैं। इंसान छटपटाने लगता है। और लंबे समय तक कोई आदत रहे, तो लत बन जाने पर क्या हालत होती है, उसका जो जायजा आज मिला, उसे देखकर मैं परेशान हो उठा। इसलिए गूगल से गुहार है कि कुछ घंटों के लिए मेंटेनेन्स के लिए रुकवाना हो, तो पूर्व सूचना देकर रुकवा लो, संबंधित पार्टियां ङोल लेंगी किसी तरह।
उड़न तश्तरी में समीर लाल ‘समीर’

 

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