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आवेग और अपराध

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के अध्यक्ष डॉमिनिक स्ट्रॉस कान्ह जिस तरह एक होटल कर्मचारी के साथ बलात्कार की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं, उससे उन्हें न सिर्फ बदनामी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि उनका सार्वजनिक करियर भी नष्ट हो गया है। वह आईएमएफ के अध्यक्ष पद के अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति पद की संभावना से भी हाथ धो बैठे हैं। फ्रांस के अगले राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें एक मजबूत उम्मीदवार की तरह देखा जा रहा था, लेकिन अब मौजूदा राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के लिए यह कांड एक राहत लेकर आया है। यह निश्चय ही गहरे विश्लेषण का विषय है कि क्यों एक इतना प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्ति कुछ क्षणों के आवेग में अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है। ऐसा नहीं है कि स्ट्रॉस कान्ह पहली बार ऐसे आरोपों के घेरे में आए हैं, इससे पहले भी वह ऐसी मुसीबतों में फंस चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि अबकी बार वह गंभीर मुसीबत में फंस गए हैं। इसी किस्म का, लेकिन इससे कहीं गंभीर मामला उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आनंद सेन का है, जिन्हें बहुचर्चित शशि हत्याकांड में एक स्थानीय अदालत ने दोषी पाया है। इसके पहले उत्तर प्रदेश में ही एक बलात्कार कांड में विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी पकड़े जा चुके हैं। एक और विधायक उदय प्रकाश बहुचर्चित मानवती बलात्कार कांड में पकड़े गए और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में प्रभावशाली नेता और पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी जेल में हैं। यह तो एक राज्य का किस्सा है। हर राज्य में इतने नहीं, फिर भी काफी सारे ऐसे कांड मिल जाएंगे, जिनमें सेक्स या प्रेम संबंधों को लेकर हत्या की वजह से राजनेताओं को मुश्किलों में फंसना पड़ा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी ऐसे ही एक संबंध की वजह से राष्ट्रपति पद गंवाते-गंवाते बच गए थे।

सत्ता व्यक्ति को जहां शक्तिशाली बनाती है, वहीं उसकी मानवीय कमजोरियों को भी मजबूती दे देती है। सत्ता का अहंकार या अति आत्मविश्वास अक्सर भावी खतरों का डर खत्म कर देता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि अक्सर ऐसे लोग सत्ता को जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सिर्फ अधिकार और मनमानी का लाइसेंस समझते हैं और आखिरकार यही गैरजिम्मेदारी उन्हें ले डूबती है। आनंद सेन जैसे लोग नई-नई मिली सत्ता से अपना विवेक खो देते हैं और अमरमणि त्रिपाठी जैसे लोगों के लिए यह एक आदत बन जाती है। दरअसल, प्राचीन काल से ही सत्ताधारी लोग महिलाओं को सत्ता के साथ मिलने वाले एक विशेषाधिकार की तरह देखते आए हैं। पुराने जमाने में यह काफी हद तक मान्य था, लेकिन आधुनिक समय के नैतिक नियमों के मुताबिक यह स्कैंडल बन जाता है। संभव है कि स्ट्रॉस कान्ह कई बार ऐसे प्रसंगों से अपनी सत्ता की ताकत के बूते बच गए हों, और आनंद सेन जैसे लोग यह मानते हों कि वे कानून, लोकतंत्र और समाज को धता दिखा सकते हैं। लेकिन पश्चिमी देशों में एक विकसित लोकतांत्रिक मूल्य और ऐसी न्यायप्रणाली है, जिसमें अपराधी को एक-सी सजा मिलती है, चाहे वह बड़ा आदमी हो या आम नागरिक। हमारे समाज में अब भी लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास उस हद तक नहीं हुआ है, इसलिए अक्सर बड़े और प्रभावशाली लोगों तक कानून के हाथ नहीं पहुंच पाते। इसलिए हमारे यहां नेताओं का व्यवहार अक्सर ज्यादा निरंकुश और बर्बर हो जाता है। एक बेहतर समाज वही होता है, जहां सत्ता का अर्थ जवाबदेही और जिम्मेदारी हो, न कि अधिकारों का दुरुपयोग। ऐसे अपराधों का पूरी तरह खत्म होना शायद संभव नहीं होगा, लेकिन ऐसी व्यवस्था अगर होगी, जिसमें कानून का डर होगा, तो ऐसी घटनाओं को बेहद कम करने में तो सफलता मिल सकती है।

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