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जनसंख्या नियंत्रण

जनगणना 2011 की रिपोर्ट भारत के विकास, आर्थिक प्रगति में मुख्य बाधक जनसंख्या व उसके अनुसार सरकार का रोजगार व सुविधाएं न दे पाना मुख्य कारण है। और अभी भी जनसंख्या नियंत्रण, परिवार नियोजन जैसी अनेक योजनाओं की सार्थक पहल करने की आवश्यकता है। हमें चीन की जनसंख्या नीतियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है और जब तक गरीब तबकों को शिक्षा, रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो पायेंगी तब तक योजनाओं को लागू कर कोई फायदा नहीं है। जनगणना में साक्षरता बढ़ोतरी व लिंगानुपात का संतुलित होना थोड़ा संतोषजनक है, किन्तु अभी भी देश को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के लिए अनेक योजनाओं व सार्थक पहल की आवश्यकता है।
अनिल सिंह भरड़ा, बागेश्वर

अभियान, टॉय-टॉय फिस्स
आज शहर के अन्दर उड़ती हुई पॉलीथिन अधिकारियों की पोल खोल रही है। दुकानदार और ठेली वाले बेखौफ होकर पॉलीथिन का उपयोग कर रहे हैं। सड़कों पर खुलेआम आश्रमों का कूड़ा डाला जा रहा है। शहर के अन्दर सफाई होने के बाद भी कुछ ही मिनटों बाद आश्रमों का कूड़ा व पॉलीथिन सड़कों पर फिर से उड़ कर शहर की खूबसूरती को खत्म कर रही है। क्या यही है सरकार का पॉलीथिन मुक्त अभियान?
चमन लाल सिरोही, हरिद्वार

महामहिम की भूमिका
जनतंत्र में राज्यपाल व राष्ट्रपति संयमी एवं निरपेक्ष होना आवश्यक होता है। परन्तु कर्नाटक में श्री हंसराज ने जिस प्रकार का गवर्नरी का आतंक फैला रखा है वह पंजाब की याद दिलाता है, जहां जैसे ही अकाली सत्ता में आते थे उनका शासन गिरा दिया जाता था और परिणाम यह निकला कि आतंकवाद फैला, हजारों लोग मारे गए और देश की सबसे सक्षम प्रधानमंत्री से देश को हाथ धोना पड़ा। हमारे देश के परिपेक्ष में गवर्नर ही नहीं राष्ट्रपति भी व्यवस्था के निर्थक अंग बनकर रह गए हैं, जिनपर 85 करोड़ भूखे लोगों की कमाई के अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 80 एकड़ भूमि पर बने राष्ट्रपति के महल-राष्ट्रपति भवन का कोई औचित्य नहीं, जब वह देश हित में पार्टी की मर्जी के बिना अफजल गुरु, कसाब या अन्य देशद्रोही को फांसी नहीं दे सकते, या दूसरी सार्थक भूमिका नहीं निभा सकता, रुलिंग पार्टी के इशारे पर नाचना पड़ता है। इस सबके मद्देनजर हंसराज को दोष देना बचकानी बात होगी। वे वही कर रहे हैं जो उनसे करवाया जा रहा है, ठीक उसी प्रकार जैसे दिग्विजय सिंह जी वही बोल रहें हैं जो उनसे बुलवाया जा रहा है। जिम्मेदार लोगों से निवेदन है कि कर्नाटक में कुछ तरक्की होने दें, सकारात्मक भूमिका निभाएं। स्वत: ही अगले चुनाव में जनता आपको भी सिंहासन पर बैठने देगी।
प्रो.के.एल.दत्ता, देहरादून

विकास की परिभाषा
एक तरफ सरकार के कर्णधार विकास यात्राएं निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बेरोजगार नौजवान नियुक्ति की मांग को लेकर आन्दोलित हैं। सरकार को उनको रोजगार देने की बजाय जेलों में बंद कर रही है जो न्यायोचित नहीं है। पिछले चार वर्षो से कितने लोगों को रोजगार मिला सब जगजाहिर है। लगता है आज यहां जनता द्वारा नेताओं के लिए चुनी सरकार काम कर रही है, ना कि आमजन के लिए। आज पहाड़ों के विद्यालयों में शिक्षक नहीं हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं है, सड़कों की खस्ता हालत है। क्या इसी को विकास कहते हैं? आज पहाड़ की गरीब जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि उनको आमजन की सुध लेने की फुर्सत नहीं है। वे शहरों में एयर कंडीशन बंगलों में आराम फरमा रहे हैं। पहाड़ में जल, जंगल, जमीन व विकास की बात करने वालों को विधानसभा में राजधानी गैरसैंण की बात करने पर क्यों सांप सूंघ गया है? क्यों वे गैरसैंण की बात भूल गए हैं।
स्वामी चेतन पहाड़ी, पौड़ी गढ़वाल

 

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