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चमड़ा व्यापारी मंडी शुल्क से परेशान

जानवरों की खालों और चमड़े का कारोबार करने वाले व्यापारी राज्य सरकार द्वारा ढाई प्रतिशत मंडी शुल्क लगाये जाने से बेहद परेशान हैं और उनका कहना है कि अगर शासन की यही नीति रही तो चमड़े का कारोबार बंद करने की नौबत आ सकती है।

कानपुर और आगरा में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी चमड़ा मंडियां हैं। यहां पूरे प्रदेश से जानवरों की खालें और बना बनाया चमड़ा प्रतिदिन ट्रकों में भर कर आता है और फिर अन्य प्रदेशों को भेजा जाता है। 31 मार्च 2006 को चमड़ा और जानवरों की खालें लाने ले जाने के कारोबार को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मंडी शुल्क से मुक्त कर दिया था। तब कारोबारियों का तर्क था कि चमड़ा न तो कृषि उत्पादन की वस्तु है और न ही यह खेती से उगता है इसलिये इसके कारोबार पर मंडी शुल्क लेने का कोई कारण नहीं है।

चमड़ा व्यापारियों के नेता और चर्म कारोबारी शाकिर अली उस्मानी ने आज यहां प्रेस ट्रस्ट को बताया कि वर्तमान सरकार ने एक अप्रैल 2011 से जानवरों की खालों और चमड़े को शहर में या बाहर लाने ले जाने पर ढाई प्रतिशत मंडी शुल्क लगा दिया है। अब यदि व्यापारी कानपुर शहर में ही एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक रिक्शा पर जानवरों की खालें लादकर ले जायेंगे तो उनको ढाई प्रतिशत मंडी शुल्क अदा करना पड़ेगा।

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