DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नो टेन्शन प्लीज!

नो टेन्शन प्लीज!

पहले रिजल्ट, फिर एडमिशन और उसके बाद मनपसंद कॉलेज या कोर्स मिलने या न मिलने का द्वंद्व छात्रों को टेन्स कर देता है। इस टेन्शन से कैसे निबटा जाए, बता रही हैं अनुराधा गोयल

आयुष का दसवीं क्लास का रिजल्ट आना है। वह पूरी तरह कॉन्फिडेंट है कि उसके अच्छे मार्क्स आएंगे। लेकिन इसके बावजूद घर का हर सदस्य उससे पूछता रहता है, 90 पर्सेट तो आ जाएंगे, कहीं ऐसा तो नहीं कि 80 पर्सेट पर ही गाड़ी अटक जाए, कहीं किसी सब्जेक्ट में फेल तो नहीं हो जाएगा। बात केवल पर्सेटेज की ही नहीं है। परिवार का हर व्यक्ति अपनी-अपनी रुचियों के हिसाब से उसे स्ट्रीम चुनने की सलाह भी देता रहता है। कोई कहता है, साइंस में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, क्या करेगा साइंस लेकर? इससे अच्छा है कॉमर्स ले, कॉमर्स का आजकल ज्यादा स्कोप है। आयुष की साइंस में रुचि है, लेकिन घर और आसपास के माहौल से वह इतना कन्फ्यूज हो गया है कि उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे? लिहाजा वह तनावग्रस्त हो गया है।

रिजल्ट को लेकर तनाव

अक्सर रिजल्ट से पहले बच्चे तनाव का शिकार हो जाते हैं। एक तनाव इस बात का होता है कि उनका अपना रिजल्ट कैसा आता है, दूसरा इस बात का कि क्या वे मां- बाप की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे और तीसरा एक अनचाहा तनाव इस बात का होता है कि कहीं उनके दोस्तों का रिजल्ट उनसे बेहतर तो नहीं आ जाएगा। इसमें पहला तनाव किसी हद तक जायज सा है। बच्चा पूरे साल मेहनत करता है और उम्मीद करता है कि उसका रिजल्ट भी उसकी मेहनत के ही अनुरूप आए। यह एक सकारात्मक सा तनाव है, जिससे बच्चा बहुत ज्यादा परेशान नहीं होता। उसकी परेशानी तब शुरू होती है, जब मां बाप जाने-अनजाने अपने सपनों और उम्मीदों का बोझ उस पर डालते हैं। बहरहाल, मां-बाप को बच्चे के मनोविज्ञान और उसकी रुचियों के हिसाब से व्यवहार करना चाहिए। यानी यदि बच्चे की साइंस में रुचि नहीं है तो उसे समझाना चाहिए कि दूसरे विषयों में भी कितना स्कोप है। यदि वह 90 पर्सेट नहीं ला सकता तो मां-बाप को उसके सामने ऐसे उदाहरण देने चाहिए, जिन्होंने कम नंबर लाकर भी सफलता के नये मुकाम हासिल किये। इससे बच्चे का तनाव कम होगा। बच्चों को इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि दूसरों का रिजल्ट क्या आएगा, क्योंकि इससे आपका रिजल्ट प्रभावित नहीं होने जा रहा।

स्ट्रीम के चयन को लेकर तनाव

खासतौर पर दसवीं और बारहवीं के बच्चों को इस तनाव से गुजरना पड़ता है। पहले दसवीं के बाद उन्हें यह तय करना होता है कि वे साइंस साइड लें या कॉमर्स या आर्ट्स। इसके लिए बच्चों को अपने पेरेंट्स, टीचर्स और फ्रैंड्स, सबकी राय सुननी चाहिए और उसके बाद अपनी रुचियों पर फोकस करना चाहिए। स्ट्रीम का चयन उन्हें अपनी रुचियों के हिसाब से ही करना चाहिए, क्योंकि आज के इस दौर में हर विषय की मांग है और किसी भी स्ट्रीम में जाकर आप अपने करियर को ऊपर की ओर ले जा सकते हैं।

अगर जरूरत पड़े तो किसी करियर काउंसलर की राय भी ले सकते हैं। बारहवीं के बाद भी कई बार साइंस स्ट्रीम के बच्चे आर्ट्स ले लेते हैं। कई बार उनके सामने मां-बाप का यह दबाव होता है कि बच्चे को हर हाल में इंजीनियर ही बनाना है। लेकिन बारहवीं तक बच्चा काफी हद तक मैच्योर हो चुका होता है, इसलिए यदि इस मोड़ पर उसे लग रहा है कि उसे स्ट्रीम चेंज कर लेनी चाहिए तो उसे खुद फैसला लेना चाहिए।

एडमिशन कहां होगा

बारहवीं के बच्चों के लिए तनाव का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि रिजल्ट के बाद उन्हें कहां एडमिशन मिलेगा। मां बाप चाहते हैं कि उनके बच्चों को दिल्ली के सबसे अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिले। साथ ही वह लगातार बच्चे को यह बताते रहते हैं कि अच्छे कॉलेज में एडमिशन के लिए 90 पर्सेट से ऊपर मार्क्स चाहिए। इससे बच्चा तनाव में आ जाता है। मां बाप को बच्चों को यह समझाना चाहिए कि आज शिक्षा के मामले में बच्चों के पास हर तरह के विकल्प मौजूद हैं, चाहे उनके नंबर कम आएं या ज्यादा। बल्कि मां बाप को बच्चों से दूसरे विकल्पों के बारे में चर्चा करनी चाहिए। इससे उनका तनाव कम होगा। साथ ही बच्चों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि अच्छे कॉलेज से ज्यादा अहम मनपसंद विषय है।

एडमिशन और एंट्रेंस टेस्ट

बारहवीं के बाद भी बच्चों के लिए एंट्रेंस टेस्ट काफी तनाव पैदा करने वाले होते हैं। इंजीनियरिंग के तमाम टेस्ट्स के अलावा कॉलेजों में भी होने वाले एंट्रेंस टेस्ट से बच्चों को लगने लगता है कि पता नहीं उन्हें कहीं एडमिशन मिलेगा या नहीं, वे किसी इंजीनियरिंग के टेस्ट में पास होंगे या नहीं। इस तनाव से मुक्ति का भी एक ही रास्ता है। सभी टेस्ट बच्चों को मस्ती में देने चाहिए, लेकिन अपनी भरपूर क्षमताओं के अनुसार। इसके बाद आप खुद देखेंगे कि सब कुछ ठीक ही होगा। क्योंकि चाहे इंजीनियरिंग का क्षेत्र हो या किसी कॉलेज में दाखिले का मामला, बच्चों के सामने आजकल बेपनाह विकल्प मौजूद हैं। आप इन विकल्पों के बारे में जान लेंगे तो तनाव खुद गायब हो जाएगा।

क्या हो मां-बाप की भूमिका

हमारे समाज में अभी तक बहुत से मां-बाप दारोगा की भूमिका में दिखाई पड़ते हैं। बच्चे उनके सामने किसी अपराधी की तरह होते हैं। यदि रिजल्ट अच्छा नहीं आया तो बच्चों की शामत, मां-बाप की इच्छा से स्ट्रीम नहीं चुनी तो बच्चों की खैर नहीं। यह स्थिति बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है। मां-बाप को चाहिए कि बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ऐसा व्यवहार जिससे बच्चे खुद उनके सामने ओपन हों और उनसे अपनी चीजें, अपने सपने, अपनी इच्छाएं और करियर से जुड़ी चीजें शेयर करने के लिए तैयार हों।

मन की उलझन
परिणाम की चिंता किये बिना अपना सौ फीसदी दें
समीर पारिख (मनोचिकित्सक)

रिजल्ट चाहे दसवीं का हो, बारहवीं का या बीए का, बच्चों में तनाव आ ही जाता है। यह तनाव कभी अच्छे मार्क्स लाने का होता है, कभी अच्छे संस्थान में एडमिशन लेने का और कभी इस बात का कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें कहीं प्लेसमेंट मिलेगा या नहीं। दरअसल बच्चों को इस तनाव से मुक्ति पाने के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखना चाहिए। यदि उन्होंने नियमित रूप से पढ़ाई की है तो इस बात के लिए तनावग्रस्त नहीं होना चाहिए कि आप टॉप पर आते हैं या नहीं। यदि पढ़ाई में आपने अपना 100 फीसदी दिया है तो तनावग्रस्त होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्हें इस बात पर तो बिलकुल भी ध्यान नहीं देना चाहिए कि दूसरों का रिजल्ट कैसा होगा। अक्सर बच्चे इस बात को लेकर ज्यादा तनाव में आ जाते हैं कि कहीं दूसरे का रिजल्ट उनसे बेहतर न हो। कभी-कभी मां-बाप भी बच्चों पर इस बात का दबाव डालते हैं कि उन्हें टॉप ही करना है या 95 प्रतिशत अंक लाने हैं। मां-बाप को बच्चों पर दबाव बनाने की बजाय उन्हें सपोर्ट करना चाहिए और आलोचक की बजाय सहायक की भूमिका निभानी चाहिए। खासतौर से जब रिजल्ट आने वाला हो तो केवल करियर की ही बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि दूसरे विषयों पर भी बात करनी चाहिए।

बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय बिताना चाहिए। करियर के चयन में बच्चे की रुचि और चॉइस को महत्त्व देना चाहिए और अपनी अपेक्षाओं और उम्मीदों को बच्चों पर नहीं थोपना चाहिए।

प्रिंसिपल का कहना है

बच्चों से फ्रेंडली संबंध बनाएं
एमआई हुसैन
प्रिंसिपल, डीपीएस, मथुरा रोड

किसी भी तरह के तनाव को दूर करने के लिए शेयरिंग सबसे अच्छी चीज है। मेरा मानना है कि वही बच्चे रिजल्ट को लेकर ज्यादा तनावग्रस्त होते हैं, जिनकी अपने मां-बाप के साथ कम्युनिकेशन संबंधी प्रॉब्लम है। इसके चलते कई बार घर में घुटन का माहौल बन जाता है। न बच्चा अपने मन की बात कह पाता है और न ही मां-बाप उससे किसी तरह की बात करते हैं। बच्चा अपने मन ही मन घुटता रहता है, वह घर में ही अकेला होता जाता है। ऐसे में वह डिप्रेशन का शिकार हो सकता है।

बहरहाल, मां-बाप को बच्चों के साथ फ्रैंडली व्यवहार करना चाहिए। यदि बच्चों में मां-बाप को लेकर ही किसी तरह का डर है तो सबसे पहले उसे निकालना चाहिए। यदि बच्चा आपसे खुल कर बात कर पा रहा है तो समझ लीजिए कि उसका आधा डर और तनाव खत्म हो जाएगा।

छात्र बोले

अपनी बात कहनी आनी चाहिए
नैंसी छात्र, लेडी श्रीराम कॉलेज

लेडी श्रीराम कॉलेज से बीएलएड कर रही नैंसी कहती हैं कि पिछले साल बारहवीं के रिजल्ट को लेकर बहुत तनाव था, लेकिन मैंने अपने तनाव को खत्म करने के लिए इंजीनियरिंग एग्जाम्स की ओर अपना मन डायवर्ट किया। मॉम और डैड ने भी लगातार समझाया कि रिजल्ट अच्छा न आने की स्थिति में भी दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी। हालांकि तनाव फिर भी रहता था। इससे निजात पाने के लिए मैं उस दौरान नॉवल्स पढ़ती थी और फ्रैंड्स के साथ चैट करती थी और उनसे मिलती भी थी। परिवार के साथ पिकनिक भी गयी। इससे मेरा तनाव काफी कम हुआ। मेरा रिजल्ट अच्छा आया और मैंने स्कूल में टॉप किया, लेकिन मैं इंजीनियरिंग नहीं करना चाहती थी। जब यह बात मैंने अपने पेरेंट्स को बताई तो वह शॉक्ड रह गये, लेकिन उन्होंने मेरी रुचियों को समझा और सपोर्ट किया। मेरा मानना है कि बच्चों को अपनी बात अपने मॉम-डेड को समझाना आना चाहिए, तभी वे उनकी बात को समझोंगे और सहायता कर सकेंगे।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नो टेन्शन प्लीज!