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थिएटर के रास्ते शिक्षा की दीक्षा

थिएटर के रास्ते शिक्षा की दीक्षा

आईआईएम और आईआईटी जैसे संस्थान छात्रों की पर्सनेलिटी ग्रूमिंग के लिए थिएटर वर्कशॉप का सहारा ले रहे हैं। एनसीईआरटी भी अपने पाठय़क्रम में ड्रामा को शामिल कर रहा है। ये कुछ ऐसी कवायद हैं, जो थिएटर में करियर की अकादमिक राहें खोल रही हैं। अरशाना अजमत की रिपोर्ट।

एक हरे-भरे बगीचे में कुछ छात्र मैकबेथ की लाइनें याद कर रहे हैं। एक लड़की उन्हें कई शब्दों पर टोकती है और सही डिक्शन समझाती है। यह लड़की बीच-बीच में छात्रों को यह भी बताती है कि किस लाइन को बोलते वक्त कैसी बॉडी लैंग्वेज होनी चाहिए। यह लड़की नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की छात्र रह चुकी है। काफी साल से गंभीर थिएटर कर रही है। छात्र थिएटर नहीं करते। छात्र आईआईएम में प्रबंधन की पढ़ाई कर रहे हैं। लड़की थिएटर के बहाने छात्रों को एक्सप्रेशन, सेंस ऑफ प्रेजेंस जैसी जीने की कलाएं सिखाती है..

ऐसा देश के किसी एक संस्थान में नहीं हो रहा है। आईआईएम, आईआईटी  समेत विभिन्न शैक्षिक संस्थानों को  युवा थिएटर एक्सपर्ट्स की दरकार है, जो उनके छात्रों को थिएटर के बहाने जीने की कला सिखा सकें। आगरा के युवा रंगकर्मी डिम्पी मिश्र कई संस्थानों में ऐसी वर्कशॉप करा चुके हैं। वह कहते हैं कि दरअसल ये संस्थान पर्सनेलिटी डेवलपमेंट पर खूब फोकस करते हैं। थिएटर पर्सनेलिटी डेवलपमेंट का सबसे बढ़िया टूल है। इसीलिए ये संस्थान थिएटर की वर्कशॉप आयोजित करते हैं।

डिम्पी इन वर्कशॉप को रोजगार के सुनहरे अवसर के तौर पर देखते हैं। वह कहते हैं, ‘ये वर्कशॉप ऐसे रंगकर्मियों के लिए रोजगार का अच्छा माध्यम हैं, जो अपने काम में माहिर हैं, मगर टीवी या फिल्मी दुनिया में नहीं जाना चाहते। महज थिएटर करके वे जीने लायक पैसा नहीं कमा पाते। ऐसी वर्कशॉप उन्हें पैसा कमाने का मौका देती हैं।’

वर्कशॉप करके आसानी से हर महीने 15 से 20 हजार रुपए कमाए जा सकते हैं। खास बात यह कि एक वर्कशॉप 10 से 15 दिन की होती है। यानी उसके बाद का समय खाली बचता है। हां, अगर कोई महीने में दो वर्कशॉप कर सके तो आसानी से अपनी आमदनी को दोगुना कर सकता है। वर्कशॉप दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों के अलावा लखनऊ, कानपुर और आगरा जैसे बी-टाउन शहरों के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में भी आयोजित हो रही हैं।

इन वर्कशॉप में छात्रों को सेंस ऑफ प्रेजेंस, वोकेबुलेरी, खुद को प्रेजेंट करने का सलीका, इंटरेक्शन की कला सिखाई जाती है। कई बार पढ़ाई की वजह से डिप्रेशन या फ्रस्टेशन में चले गए छात्रों को बाहर लाने के लिए उनसे नाटक कराए जाते हैं। इससे उनके मन की भावनाएं बाहर आती हैं और वे तरोताजा महसूस करते हैं। एक तरह से छात्रों को रिफ्रेश करने के लिए थिएटर को बतौर थेरेपी इस्तेमाल किया जाता है।

विकसित होती हैं दूसरी स्किल

नामचीन संस्थानों में जो लोग बतौर थिएटर एक्सपर्ट वर्कशॉप कराते हैं, उनमें टीचिंग और मोटिवेशनल  स्किल विकसित होती है। मुंबई के अरण्य थिएटर ग्रुप के संचालक मानव कौल कहते हैं, ‘इसके बाद युवा बतौर पर्सनेलिटी गुरु या मेंटर का भी काम कर सकते हैं। वर्कशॉप पैसे कमाने का अच्छा माध्यम हो सकती हैं।’ इतना ही नहीं, देश भर में बिखरे थिएटर के शैक्षिक संस्थान ऐसे युवाओं को अपने यहां बतौर गेस्ट फैकल्टी आमंत्रित करती हैं।

दरअसल यह ट्रैंड एनएसडी या बीएनए की तर्ज पर देश के दूसरे थिएटर संस्थानों ने शुरू किया है। एनएसडी जैसे संस्थान जहां अनुभवी रंगकर्मियों को आमंत्रित करते हैं, वहीं ये संस्थान 30 के आसपास की उम्र के ऐसे युवा रंगकर्मियों को बतौर गेस्ट फैकल्टी बुलाते हैं। ये अलग-अलग शहरों के शैक्षिक संस्थानों में थिएटर के बहाने पर्सनेलिटी रिफॉरमेंट के मंत्र देते हैं। दिल्ली रंगमंडल, जामिया यूनिवर्सिटी समेत हर प्रदेश में ऐसे सरकारी और प्राइवेट संस्थान हैं। यहां 10 या 15 दिन की क्लास के बदले आपको 15 से 20 हजार रुपए मिल सकते हैं। इसके अलावा अपना पार्ट टाइम काम भी शुरू किया जा सकता है। छोटे बच्चों को थिएटर की एबीसी सिखाई जा सकती है।

रंगमंच यानी करियर का नया दरवाजा

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के रेपटरी चीफ सुरेश शर्मा की मानें तो हर प्रदेश में नाटय़ विद्यालय खुलने वाले हैं। इनमें नाटकों के जानकारों की जरूरत है, जो दूसरों को जागरूक कर सकें। मध्य प्रदेश में तो एक जुलाई से इसकी शुरुआत भी हो रही है।

उम्मीद है जल्द ही दूसरे प्रदेशों में भी ऐसे स्कूल खुल जाएंगे। यहां टीचिंग से लेकर प्रोडक्शन तक के कई काम तलाशे जा सकते हैं। सुरेश शर्मा कहते हैं,‘इन दिनों देश भर में थिएटर की बाबत ऐसी कई कवायदें चल रही हैं। इन कवायदों के तहत थिएटर एजुकेशन पर खूब जोर दिया जा रहा है। युवा रंगकर्मियों के लिए ये अच्छे अवसर हैं।’ ऐसे ही अवसर एनसीआरटी भी देने जा रही है।

एनसीआरटी जल्द ही प्राइमरी लेवेल पर ड्रामा को बतौर सब्जेक्ट लॉन्च कर रही है। इसके बाद देश भर के स्कूलों में ऐसे थिएटर एक्सपर्ट की मांग बढ़ जाएगी, जो बच्चों को ड्रामा पढ़ा सकें।

सुरेश शर्मा बताते हैं कि देश भर की कई यूनिवर्सिटी में तो ड्रामा डिपार्टमेंट बन भी गए हैं और कई जगहों पर ड्रामा को सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जा रहा है। पुणे यूनिवर्सिटी, गोवा यूनिवसिर्टी, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, इग्नू इनमें शामिल हैं। यानी यहां भी बतौर लेक्चरर जॉब तलाशी जा सकती हैं। लेकिन यहां प्राथमिकता उन्हीं को मिलेगी, जिन्होंने थिएटर की पढ़ाई की हो या जिनके पास काम का बहुत अच्छा अनुभव हो।

और हां, अगर आपको लगता है कि ये काम रंगमंच के दिलचस्प मिजाज के खिलाफ ऊबाऊ हो सकता है तो आप गलत सोचते हैं, क्योंकि यहां परंपरागत क्लासरूम जैसा माहौल नहीं होगा। यह थिएटर की क्लास होगी, इसलिए क्रिएटिविटी की दरकार यहां हमेशा होगी।

वरिष्ठ रंगकर्मी अरविंद गौड़ कहते हैं,‘यहां अपॉइंटमेंट ही अकादमिक योग्यता से ज्यादा क्रिएटिव स्किल के आधार पर होता है।’ यानी काम में क्रिएटिविटी की गुंजाइश बनी रहेगी।

सक्सेस स्टोरी/नीलम (थिएटर एक्सपर्ट)
थिएटर की परफेक्ट जानकारी होनी चाहिए

आपका थिएटर बैकग्राउंड बहुत अच्छा होना चाहिए, जैसे मैंने भारतेन्दु नाटय़ अकादमी और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दोनों जगह से पढ़ाई की थी। इसके अलावा एफटीआईआई से डायरेक्शन में तीन महीने का कोर्स भी किया था। अगर आपकी एकेडमिक क्वालिफिकेशन बहुत मजबूत नहीं है तो भी आपके पास काम का अच्छा अनुभव जरूर होना चाहिए।

मैं अपनी बात करूं तो मैंने यूपी थिएटर फेस्टिवल समेत देश के कई नामचीन थिएटर समारोहों में परफॉर्म किया था। मैंने कई नामचीन हस्तियों की टीम के साथ शोज़ किए थे। 

आपके पास थिएटर की कंप्लीट जानकारी होनी चाहिए। मैंने खुद को सिर्फ अभिनय  तक नहीं समेटा था। मैंने दूरदर्शन, आकाशवाणी के कार्यक्रमों के लिए स्क्रिप्ट लिखी थी। मंटो की कहानी से ड्रामे तैयार किए थे। सेट डिजाइन और डायरेक्शन भी सीखा था।

एक्सपर्ट व्यू
ऑन स्टेज और ऑफ स्टेज दोनों का अनुभव जरूरी
अरविंद गौड़

अरविंद गौड़ ने आईआईएम जैसे संस्थानों में कई वर्कशॉप की हैं। अपने थिएटर ग्रुप में युवाओं को रंगमंच की बाबत ट्रेनिंग भी देते हैं। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों में थिएटर की कौन-कौन सी स्किल होनी चाहिए। उनके अनुसार थिएटर में कम से कम 4 या 5 साल तक अच्छा काम करने का अनुभव हो। छह महीने थिएटर का शौकिया थिएटर करने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है। ऑन स्टेज और ऑफ स्टेज, दोनों तरह के काम का अनुभव हो। थिएटर से जुड़ी हर चीज की जानकारी होनी चाहिए, तभी आप क्लासरूम में छात्रों के सवालों के जवाब दे पाएंगे। बातचीत की कला में निपुण होना चाहिए, ताकि अपनी बात से दूसरों को रजामंद कर सकें। हर तरह की स्थिति और माहौल में काम करने के आदी हों।

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