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नाम जैसा काम नहीं कर रहे आईआईटी

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटीज कहने को तो देश की शान बन चुके हैं। वे ब्रांड इंडिया हैं। लेकिन अपनी शान के मुताबिक ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं जिससे समाज को कोई फायदा पहुंचा हो। जबकि समाज उनसे जल संसाधनों के प्रबंधन, शहरी योजनाएं, यातायात प्रबंधन और सेनिटेशन जैसी समस्याओं के समाधान की बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखता हैं।

एक उच्चस्तरीय सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है जो परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने 3,785 विशिष्ट लोगों पर किया है। इनमें 2,085 पूर्व छात्र थे। बाकी लोगों में उद्योग जगत, सरकारी अफसर, समाज के विशिष्ट व्यक्ति, आईआईटी छात्र, शिक्षक और स्टॉफ शामिल थे।

इसमें 23 फीसदी के अनुसार, आईआईटी अपनी तकनीक बेच पाने में विफल रहे। 40 फीसदी ने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि आईआईटी ने किसी खास अनुसंधान में भूमिका निभाई हो। 63 फीसदी लोगों ने कहा कि आईआईटी से समाज को कोई लाभ नहीं मिला। 87 फीसदी की राय है सरकार आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी जैसे संस्थानों अपने योजनाओं में शामिल करके उनके कौशल का लाभ उठाए। वैसे 20 फीसदी का यह भी मानना है यदि शोध के लिए दबाव बना तो पढ़ने का माहौल खराब होगा।
(दिल्ली संस्करण)

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