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घटनाओं को तमाशा बनाने का खेल

बीते एक-डेढ़ महीने का समय खबरों के लिहाज से काफी हलचलों वाला रहा। अन्ना के आंदोलन की खबरें अभी शांत हुई भी नहीं थीं कि शांति भूषण और सीडी का मामला गरमाने लगा। इसी बीच सत्य साईं बाबा का निधन हो गया। इसके तुरंत बाद ब्रिटिश राजकुमार विलियम और केट की शादी दुनिया भर में मीडिया की सुर्खियों में छा गई। इसको मीडिया पूरे तामझाम के साथ कवर कर ही रहा था कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर आ गई। इसकी रिपोर्टिग जारी ही थी कि ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल में किसान असंतोष के बाद हिंसा हो गई। इससे जुड़ी खबरें चल ही रही थीं कि पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजे आ गए। जब तक मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक मौके को ठीक से कवर कर पाता, इससे पहले ही उसे दूसरी खबर की तरफ दौड़ना पड़ा।

ये सभी घटनाएं काफी न्यूज वैल्यू वाली थीं। इनमें लोगों की दिलचस्पी बहुत ज्यादा थी और इनका देश-दुनिया पर असर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन इन सभी घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसे पेश किया है, जैसे मानो बड़ा तमाशा हो रहा हो। पिछले कुछ साल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खबरों को दिखाने का अंदाज काफी बदल चुका है। कई बार तो लगता है कि उसकी दिलचस्पी घटनाओं को दिखाने की नहीं होती, बल्कि वह उन्हें ड्रामे के तौर पर पेश करता है। चैनल वालों की राय में ऐसा करना लोगों की दिलचस्पी को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। हालांकि इस दौरान अलग-अलग पहलुओं को कुछ इस तरह से निकाला जाता है, जिनका उस खबर विशेष से कोई लेना-देना नहीं होता।

समाचार चैनल 24-24 घंटों के हो गए हैं, दिन भर के उनके प्रसारण के चलते अखबारों पर भी दबाव बढ़ा है। अब अखबार भी किसी घटना को टीवी वाले अंदाज में परोसने की कोशिश करते हैं। वहां भी बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपने लगी हैं और घटनाओं के फॉलोअप के जरिये अखबार के अंदर ही टीवी बनाने की कोशिशें हो रही हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खबरों को किस आधार पर दिखाया जाता है, इसे समझने के लिए यह देखना होगा कि यहां के तमाम समाचार चैनलों ने ब्रिटिश राजकुमार विलियम और केट की शादी को लाइव दिखाया। हालांकि यह शादी दुनिया भर में विश्वसनीय समाचार चैनलों, बीबीसी और सीएनएन पर भी लाइव दिखाई गई। इस शादी को लेकर दुनिया भर में दिलचस्पी खूब थी। लेकिन भारत के हिंदी चैनलों पर भी इसका लाइव प्रसारण चौंकाने वाला था। और तो और, वे इस शादी में जुटे लोगों की संख्या के आधार पर लोकतंत्र और वहां की राजशाही का विश्लेषण करने लगे। जबकि ब्रिटेन की जनता लंबे अरसे से लोकतंत्र और राजशाही के साथ तालमेल बिठा चुकी है। हाल ही में वहां हुए एक सर्वे में 80 फीसदी लोगों ने राजशाही के प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित किया था। संतुलित नजरिये से देखें, तो ब्रिटिश राजकुमार की शादी थी, जिसमें कुछ हाई प्रोफाइल गेस्ट शामिल हुए थे। इंग्लैंड के लोग अपने राजकुमार की शादी को देखने के लिए जश्न मनाते हुए लाखों की संख्या में सड़कों पर निकले। कई चैनलों पर इस शादी की तुलना प्रिंस और डायना की शादी से करते हुए दोनों में समानताएं दिखाई गईं, जबकि प्रिंस और डायना के बीच शादी से पहले कोई अंतरंगता या जान-पहचान भी नहीं थी और विलियम-केट के प्रेम-प्रसंग की बात काफी पुरानी है।

ओसामा की मौत के बाद टीवी चैनलों पर अमेरिकी कमांडोज की कार्रवाई का वीडियो भी कल्पना के आधार पर दिखाया जा रहा है। अमेरिकी सरकार ने कोई वीडियो जारी नहीं किया है, लेकिन टीवी चैनलों पर लगातार एनिमेटेड वीडियो दिखाए जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी इसमें हो सकती है, लेकिन समाचार दिखाने के नाम पर ऐसे वीडियो को नहीं दिखाया जा सकता, जो कल्पना के आधार पर तैयार किए गए हों।

पिछले कुछ साल में भारत के इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के प्रचार-प्रसार में काफी इजाफा हुआ है। चैनलों की संख्या बढ़ी है। अखबारों ने अलग-अलग जगहों से अपने संस्करण निकालने शुरू किए हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि जितनी गुजांइश बढ़ी है, उतनी खबरें मीडिया नहीं परोसता। ऐसा नहीं है कि खबरें मौजूद नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि लोगों के काम करने का नजरिया बदल चुका है। मीडिया घटना को सनसनीखेज बनाने में जुट जाता है। खबरों को सनसनीखेज बनाने की कोशिशों के चलते ही मीडिया की विश्वसनीयता घटी है। 

हमारे समय में सुविधाएं काफी कम थीं। तकनीकी सुविधाएं तो नाममात्र की थीं, लेकिन हमारे दौर में खबरों को किसी एक सोच से प्रसारित करने की आजादी नहीं होती थी। खबरों को हर लिहाज से संतुलित और निष्पक्ष रखने की कोशिश होती थी। खबर को प्रसारित करने से पहले हर पहलू को उसमें शामिल किया जाता था। मौजूदा दौर में मीडिया में खबरों को दिखाए जाने में एक और प्रवृत्ति बढ़ी है, ज्यादातर पत्रकारों को लगता है कि खबर दिखाने का मतलब नकारात्मक खबरें दिखाना और आलोचना करना ही रह गया है। ठीक है, यह जानना और बताना जरूरी है कि क्या गलत हो रहा है, लेकिन साथ में यह दिखाना भी उतना ही जरूरी है कि समाज में क्या सही हो रहा है।

आधुनिक समय में खबरों का दायरा और उसके क्षेत्र भी काफी बढ़ गए हैं। मसलन, हमारे समय में पर्यावरण से जुड़ी इक्का-दुक्का खबरें ही होती थीं, आज इससे जुड़ा कोई भी मसला सुर्खियों में आता है। साइबर क्राइम तो था ही नहीं, अब इससे जुड़ी खबरें प्रमुखता से छपती या दिखाई जाती हैं। यानी समाज और लोगों की जीवनशैली में ऐसे कई बदलाव हुए हैं, जो खबरों में जगह बना सकते हैं। एक अहम बदलाव यह भी हुआ है कि आजकल मीडिया संस्थानों पर बाजार का दबाव बढ़ा है। इससे बहुत सारे परंपरागत मूल्य बदले हैं। ऐसी हालत में भारत में एक पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग का होना जरूरी है, ताकि एक ऐसा भी मीडिया मौजूद हो, जहां मुनाफा कमाने का दबाव नहीं हो।

मीडिया संस्थानों को यह भी समझना होगा कि मुनाफा कमाने की होड़ में भी उनका मुख्य ध्यान समाचार और उसके कंटेंट पर ही होना चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब उन्हें दर्शक और पाठक ही नहीं मिलेंगे। ऐसे में, अपने भविष्य का आकलन वे खुद कर सकते हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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