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सिसौली का शेर दे गया जीने का नया नजरिया

धूप बहुत तेज थी और आज यहां रणसिंघों की गूंज भी नहीं थी। हजारों की भीड़ चुप्पी साधे थी और चिता की लकड़ियों की चर-चर कर जलने की आवाज इस शांति को भंग कर रही थी। यह था मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव का दृश्य। किसानों के मसीहा, महात्मा और बाबा के नाम से जाने गए चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत पंचतत्व में विलीन हो गए। किसानों का शेर, जो किसानों के हित के लिए दहाड़ा करते थे, हमेशा के लिए मौन हो गए।

सादगी की मिसाल पेश करने वाले महात्मा टिकैत अक्खड़ तो थे, पर अनाड़ी नहीं। सोच बदलने से ही नजरिया बनता या बदलता है। टिकैत ने इसे भांप लिया था और किसानों के हक-हकूक की लड़ाई छेड़ी थी। एक और अजूबा यह है कि जिस महेंद्र सिंह टिकैत को दुनिया जानती है, वह तो 52 साल की उम्र में पैदा हुआ। लेकिन आठ साल की उम्र में ही किसानों की लड़ाई में कूद पड़ने वाले टिकैत को जब खाप ने पकड़ी पहनाई, तब तक तो वह आधी सदी जी चुके थे।
वह हमेशा यही मांग करते रहे कि 1967 को आधार वर्ष मानकर फसलों का मूल्य तय किया जाए। सातवीं पास टिकैत का कहना था कि डीजल की कीमत से या पेट्रोल की कीमत के अनुपात में किसानों को फसल का मूल्य मिलना चाहिए। धुन के धनी टिकैत अगर इतना अर्थशास्त्र समझते थे, तो फौजी की तरह रणनीति बनाना भी जानते थे। बड़े आंदोलन से पहले वह अपने दूतों को जायजा लेने के लिए भेजते थे। जिसे आप रैकी कह सकते हैं। घेराबंदी कमांडो की तरह करते थे। याद कीजिए मेरठ कमिश्नरी का घेराव, जब रसद के लिए बाकायदा सप्लाई चेन की व्यवस्था की गई थी। हरेक व्यक्ति को अपना किरदार भी पता था। लेकिन हुक्म सिर्फ कमांडर का चलता था।

सरकार को तंग करने का एक और नायाब तरीका उन्होंने ढूंढ़ा था। यह था पशुओं के साथ गिरफ्तारी देने का। यदि किसानों को हिरासत में लिया जाता था, तो थानों की हालत किसी पशुशाला जैसी हो जाती थी। इसीलिए उन्हें गिरफ्तार करना भी टेढ़ी खीर बन जाता था। टिकैत और भारतीय किसान यूनियन का खौफ भ्रष्टाचारी अधिकारियों पर इस कदर हावी था कि उस दौर में मलाईदार माने जाने वाले विभाग के अधिकारी इस समूची पट्टी में अपना ट्रांसफर नहीं चाहते थे। उनकी बेलौस और सीधी बात ही हुंकार बन जाती थी।

टिकैत यह कहते हुए दुनिया से गए कि अभी और लड़ाई बाकी थी, पर वास्तव में टिकैत से पहले का कालखंड और उनके बाद का कालखंड अलग तो हो ही चुका है। किसानों से अब लेखपाल, पटवारी और बिजली महकमे के अधिकारी डरते हैं। सिंचाई और बिजली के हालात पहले से बेहतर हुए हैं। टिकैत भले ही चिरनिद्रा में सो गए हों, पर किसानों को वह जगा गए हैं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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