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बदला जो लेना है

अपने कमरे में खुद को कैद-सा कर लिया था। शाम हो रही थी, लेकिन वह दोपहर बाद से ही बाहर नहीं निकले थे। अकेले में वह बड़बड़ा रहे थे। ‘मैं उसे जवाब दूंगा। मैं उसे ठीक कर दूंगा।’

पिछले साल ऑस्ट्रिया की ग्रैज यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर पीटर फिशर और उनकी टीम ने इंग्लैंड की औरतों पर एक रिसर्च की थी। यह बदले की भावना को लेकर ही थी। उसका मानना था कि पहचान का खतरा होने पर बदले की भावना ज्यादा हावी होती है।

हमें सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है, जब हमारी पहचान पर ही कोई उंगली उठा देता है। हमारी पहचान खतरे में पड़ती है, तो हम छटपटा उठते हैं। अब जिसने उस पहचान पर चोट की है, उससे बदला लेने की इच्छा होने लगती है। बदला अपने आप में कोई अच्छा या बुरा नहीं होता। उसे हम किस तरह लेते हैं? उससे वह अच्छा-बुरा होता है। 

अगर हम उसे कड़वी दवा की तरह लेते हैं, तो वह हमारे लिए अच्छा होता है। अगर हम उसे जहर की तरह लेते हैं, तो वह बुरा होता है। सचमुच शुरू में वह जहर की तरह चढ़ता है। लेकिन वही हावी रहता है, तो हमारा ही नुकसान होता है। दवा का घूंट कड़वा होता है। लेकिन धीरे-धीरे वह हमें भीतर से ठीक करता है। जहर हमें ठीक नहीं कर सकता। हम समझते हैं कि उसे जहर पिला रहे हैं। लेकिन तिल-तिल कर हम मर रहे होते हैं। दरअसल, हमारी एनर्जी हम पर ही लगनी चाहिए। दूसरे पर एनर्जी खर्च करने का कोई मतलब नहीं है।

हमारी पहचान ही तो हमारी बुनियाद होती है। उसे ही कोई उखाड़ने की कोशिश करे, तो अच्छा किसे लगेगा? लेकिन कहीं ऐसा न हो कि बदले की आग में हम खुद अपने को जला डालें। हमें ऐसा कुछ करना चाहिए, जिससे हमारी बुनियाद और मजबूत हो। उसे छोड़ो, अपना खयाल करो भाई।

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