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कुछ सवाल रह गए बादल दा

बादल दा, अनायास ही एक साइट पर आपकी मृत्यु का समाचार पढ़ा, तो थोड़ी देर के लिए भरोसा ही नहीं हुआ। भरोसा इसलिए भी नहीं हो पा रहा था, क्योंकि आपसे करने के लिए चंद सवाल जो रह गए थे। हां, बादल दा एक इच्छा थी कि आपसे एक दिन जरूर मिलूंगा और मिलकर कुछ सवाल करूंगा। वे सवाल, जो असल में अनसुलझे नहीं थे, बल्कि आपने उन्हें उलझाकर रख दिया था। जब भी आपका कोई नाटक देखा, सवाल करने की इच्छा उतनी ही तीव्र हुई। परंतु जब भी आपको लिखने के लिए सोचा, थोड़ी झिझक ने मुझे रोक लिया। यह जानते हुए भी कि आप नहीं रहे, आज वे सवाल पूछ रहा हूं। सवाल इसलिए भी जरूरी हैं कि आपकी विरासत तीसरा रंगमंच (थर्ड थिएटर) के रूप में जिंदा है।
जो लोग आपके नाटकों को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए हैं, उन्हें क्या समझ में नहीं आता कि आपके नाटक असंगति (एब्सर्डिटी), घिनौनेपन (सरडिडनेस) और भ्रम (कन्फ्यूजन) की बेतरतीब जोड़-तोड़ पर टिके हुए हैं। ऐसा भ्रम, जिसमें सार्थक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। बिना सार्थक और सुंदर जीवन की कल्पना किए हुए कोई क्रांति के बारे में कैसे सोच सकता है? बेतरतीब जोड़-तोड़ तो भ्रम ही पैदा करती है, क्रांति नहीं लाती बादल दा। ..हां, आपके नाटक जुलूस (मिछिल) में कुछ क्रांतिकारी-सा दिखा था, जब आम आदमी जुलूस से जुड़ता है। उस जुलूस की विडंबना यह है कि आपका आम आदमी जुलूस में क्रांति के लिए नहीं जुड़ता, बल्कि उसकी खोज एक सच्चे आत्म तक सीमित कर दी जाती है। आखिर आपका जुलूस किसके खिलाफ था?
हाशिया में ब्रह्म प्रकाश

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