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अब चांदी नहीं, हमारे दिल टूटते हैं

भाव जब टूटते हैं, तो अच्छा लगता है। चांदी 5,000 रुपये टूट गई। एक दिन पहले बेचने से फायदा हो गया। एक दिन बाद खरीदी से दूसरे को फायदा। मान लो कि और भाव टूटा, तो जो लोग चांदी को भी सोने जैसा पहुंच से बाहर मान रहे थे, वे थोड़े खुश हो सकते हैं। ब्याह-शादी में गहने तो दिए ही जाते हैं। उसके अभाव में रिश्ता बोझ बन जाता है। कलह की स्थिति बन जाती है। चांदी का टूटना दिल के टूटने जैसा है, इसकी आवाज नहीं होती। आवाज तो बरतन करते हैं। टूटते-फूटते भी हैं। अपोलो 11-मून अभियान शायद इसीलिए छेड़ा गया हो कि चांद पर चांदी के भंडार मिलें। तब सोना भी टूट जाए। उस समय वहां पानी तक नहीं मिला। मिट्टी को गेहूं उगाने लायक समझा गया। यानी मेरे चांद की धरती सोना उगले.. वगैरह। वैसे हम गेहूं को कनक भी कहते हैं, सोने को भी कहते हैं, वैसे कहते तो धतूरे को भी हैं। एक उम्मीद जगी कि धरती की मिट्टी मृत हुई, तो संजीवनी चांद की मिट्टी से मिलेगी। वैसे बहुत-से लोग मानते हैं कि गेहूं ही असली सोना है। अगर गेहूं की फसल अच्छी हो जाए। सरकारी समर्थन मूल्य से अगर किसान को अच्छे दाम मिल जाएं, तो वह सोना खरीदने निकल पड़ता है। बस गेहूं की फसल बाजार में बिकते ही अक्षय तृतीया का त्योहार आ जाता है। गेहूं गया भारतीय खाद्य निगम के गोदाम में और उससे मिले पैसे पहुंच गए सुनार के खाते में। यह सोना भी बाद में घर में नहीं रहता। आखिरकार यह किसी चोर, साहूकार, समधी या दामाद के ही हवाले हो जाता है।

लेकिन यहां बात सोने की नहीं, चांदी की है, जो आजकल इस तरह चमकने लगी है कि सोने को भी फीका कर दे। इसे कुछ लोग गरीबों का सोना भी कहने लगे हैं। लेकिन बाजार में कमाई के मामले में आजकल इसने सोने को ही गरीब बना दिया है। दाम बढ़ते हैं और टूटते हैं, तो चांदी तो सटोरियों की होती है। वह सोने के दाम बढ़ने पर भी होती है, वह चांदी के दाम बढ़ने पर भी होती है। और तो और मिट्टी यानी जमीन-जायदाद के दाम बढ़ने पर भी चांदी उन्हीं की होती है।

 

 

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