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शुरू से ही जवाब देने के मूड में थी आयरन लेडी

तमिलनाडु में पिछले दिनों संपन्न विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ द्रमुक को धराशायी कर अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन को शानदार विजय दिलाने वाली जयललिता ने तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभाली है।

अन्नाद्रमुक राज्य में 2004 से ही चुनावों में हार का सामना कर रही थी, लेकिन जयललिता ने इस बार द्रमुक विरोधी मतों को बिखरने से बचाने के लिए पूरी तैयारी की और छोटे व जाति आधारित दलों से गठबंधन कर अपने राजनीतिक कौशल को साबित कर दिखाया।
 इससे पहले जयललिता 1991 से 1996 तक और 2001 से 2006 तक राज्य की मुख्यमंत्री रही थीं।

कार्यकर्ताओं के बीच अम्मा के तौर पर लोकप्रिय 63 वर्षीय जयललिता ने इस बार द्रमुक विरोधी मतों को बिखरने से बचाने के लिए विजयकांत की डीएमडीके और वाम दलों के साथ गठबंधन किया। उन्होंने अपने गठबंधन में छोटे-छोटे दलों को भी शामिल करने का प्रयास किया। अभिनेता से नेता बने विजयकांत की पार्टी डीएमडीके के साथ अन्नाद्रमुक के अच्छे संबंध नहीं थे। वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों और 2009 के लोकसभा चुनावों में डीएमडीके को द्रमुक विरोधी मतों के विभाजन का जिम्मेदार माना गया था। लेकिन इस बार जयललिता ने द्रमुक की पराजय सुनिश्चित करने के लिए डीएमडीके से हाथ मिला कर अपने गठबंधन में उसे शामिल कर लिया।

अभिनय की दुनिया से राजनीति में आयी जयललिता इस बार शुरू से ही द्रमुक को जवाब देने के मूड में दिख रही थीं। जब द्रमुक ने मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मिक्सर, ग्राइंडर आदि देने की घोषणा की, तो उन्होंने भी कई ऐसी घोषणाएं कीं। जयललिता पर आरोप लगता रहा है कि वह अपने सहयोगी दलों के साथ मंच साझा नहीं करतीं। लेकिन इस बार उन्होंने इस आरोप को गलत साबित करते हुए विभिन्न सहयोगी दलों के साथ कई चुनावी सभाएं कीं। इस क्रम में वह माकपा नेता प्रकाश करात, भाकपा नेता डी राजा, तेदेपा प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के साथ चुनावी सभाओं में दिखीं।

अपने सख्त फैसलों के लिए आयरन लेडी और तमिलनाडु की मार्ग्रेट थैचर कहलाने वाली जयललिता ने इस बार सीधे मतदाताओं से संपर्क किया। जयललिता को अन्नाद्रमुक के संस्थापक स्व एमजी रामचंद्रन राजनीति में ले कर आए थे। वह 1982 में पहली बार राज्यसभा की सदस्य बनीं। मैसूर में संध्या और जयरमण के घर पैदा हुईं जयललिता को सिर्फ 15 साल की उम्र में घर की मदद के लिए अभिनय के क्षेत्र में आना पड़ा। जयललिता ने करीब तीन दशक के फिल्मी करियर में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और हिंदी की करीब 300 फिल्मों में काम किया। उन्होंने एमजीआर और शिवाजी गणेशन सहित उस दौर के सभी प्रमुख अभिनेताओं के साथ काम किया।

एमजीआर चाहते थे कि जब वह सरकार के कार्यों में व्यस्त रहें, तो कोई उनकी ओर से पार्टी कैडरों के साथ संवाद स्थापित करे। इसीलिए उन्होंने जयललिता को पार्टी की प्रचार सचिव नियुक्त किया। लेकिन पार्टी में आरएम वीरप्पन और दिवंगत एसडी सोमसुंदरम जैसे दिग्गजों ने इसका विरोध किया। हालांकि 1991 में जयललिता के मुख्यमंत्री बनने पर उनका रुख बदल चुका था। वर्ष 1987 में एमजीआर का निधन हो गया और उनकी पत्नी जानकी कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बनीं। एमजीआर की असली राजनीतिक उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए जयललिता ने पार्टी का विभाजन कर दिया। तब हुए विधानसभा चुनाव में जयललिता के गुट ने 23 सीटें जीतीं और जानकी को केवल एक सीट मिली।

जयललिता ने पहली बार 1991 में प्रदेश की मुख्यमंत्री का पद संभाला। 1991 में विधानसभा चुनावों के दौरान ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो गई और इसके बाद उपजी सहानुभूति लहर से अन्नाद्रमुक-कांग्रेस को फायदा हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लिट्टे पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया। हिन्दुत्व के प्रति अपना झुकाव रखने वाली जयललिता भाजपा और शिवसेना के अलावा उन कुछ नेताओं में थीं जिन्होंने कार सेवा और अयोध्या का समर्थन किया था।

मुख्यमंत्री के रूप में जयललिता का पहला कार्यकाल विवादों से घिरा रहा और उनके दत्तक पुत्र वी एन सुधाकरन की शादी में हुए खर्च की व्यापक स्तर पर आलोचना हुई। वर्ष 2001 में मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने लॉटरी टिकटों पर प्रतिबंध लगा दिया और हड़ताल कर रहे करीब दो लाख कर्मचारियों को एक ही झटके में बर्खास्त कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने किसानों को मुफ्त बिजली जैसी सुविधाओं पर भी रोक लगा दी। लेकिन 2004 में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद उनके रुख में कुछ नरमी आयी।

राज्य में 13 अप्रैल को हुए विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक नीत गठबंधन ने 234 में से 200 सीटों पर जीत हासिल की। अकेले अन्नाद्रमुक की झोली में 150 सीटें आईं।

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  • Web Title:अभिनेत्री से आयरन लेडी तक का सफर