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प्रकृति और मनुष्य से जूझ रहा है ताजमहल

विश्वप्रसिद्ध पुरातात्विक धरोहर ताजमहल को प्रकृति और मनुष्य से दोतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। गर्मी के दिनों में सूखी यमुना से उड़कर आती रेत और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों की ओर से आने वाली धूलभरी हवाएं इस स्मारक को बेरंग कर इसकी खूबसूरती पर धब्बा लगाने की कोशिश कर रही हैं।

संरक्षणविदों का कहना है कि ताजमहल को न केवल प्रकृति से खतरा है बल्कि लोगों द्वारा फैलाया जा रहा प्रदूषण भी इसके लिए काफी हानिकारक साबित हो रहा है। यहां पर्यटकों के बहुत अधिक संख्या में पहुंचना और वाहनों की भारी आवाजाही भी प्रदूषण की वजह बन गए हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ता और 'वेक अप आगरा' संगठन के अध्यक्ष शिशिर भगत कहते हैं, ''वर्ष 1985 में इस शहर में लगभग 40,000 वाहन थे। उस समय फिरोजाबाद भी आगरा का हिस्सा हुआ करता था लेकिन यह संख्या अब लगभग 800,000 तक पहुंच गई है। हवा में प्रदूषकों की मात्रा बढ़ गई है।''

एक प्रख्यात इतिहासकार आर.सी. शर्मा के मुताबिक कभी 'बाग ए बहिश्त' मतलब जन्नत का बागीचा नाम से मशहूर ताजमहल आज केवल एक अन्य पर्यटन स्थल के रूप में रह गया है।

शर्मा कहते हैं, ''जब प्रतिदिन हजारों पर्यटक इस प्रसिद्ध स्मारक को देखने आते हैं तो वे अपने हाथों और पैरों के निशान सफेद पत्थरों पर छोड़ जाते हैं। उनके सांस लेने के दौरान वे वातावरण में हानिकारक गैस छोड़ते हैं जिसका बहुत बड़ा प्रभाव ताजमहल पर पड़ता है।'' शर्मा के मुताबिक कई पर्यटक इस इमारत की ऐतिहासिकता के बारे में जागरूक हैं और वे इस महान धरोहर की कीमत भी समझते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें ताज की पाकीजगी का कोई ख्याल नहीं।

पर्यटन उद्योग से जुड़े अभिनव जैन कहते हैं, ''इस स्मारक का निर्माण मूल रूप से हर दिन 50 या 100 पर्यटकों के आने के लिए किया गया है लेकिन आज इसकी कोई सीमा नहीं है। पर्यटन विभाग और आगरा विकास प्राधिकरण की ओर से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त प्रयास किया जा रहा है जिससे पर्यटकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।''

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