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इस जनादेश को जनता जनार्दन की जीत मानिए

इस जनादेश को जनता जनार्दन की जीत मानिए

ये जनता जनार्दन का नया नजरिया है जो राजनेताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। पांच राज्यों के चुनाव इसका उदाहरण हैं। आम आदमी ने तय कर रखा था। वोट उसको जो काम करे। मजबूरी में अगर भ्रष्टाचारियों में से किसी को चुनना हो तो अपेक्षाकृत कम को चुनेंगे ताकि जनधन की बंदरबांट कम हो।

तमिलनाडु से शुरू करते हैं। किसे गुमान था? ‘करुणानिधि एंड फेमिली’ इस हश्र को हासिल होगी? ठीक है। ए. राजा और कनिमोझी भ्रष्टाचार की कालौंच में ऊपर से लेकर नीचे तक सने नजर आ रहे थे। पर जयललिता कौन सी बेदाग हैं? वे भी जेल की हवा खा चुकी हैं। फिर द्रमुक सुप्रीमो के पास लुटाने के लिए अथाह पैसा और साधन थे। चुनाव आयोग ने तमिलनाडु से करोड़ों रुपये बरामद कर साबित कर दिया था कि मतदाताओं में वोट के लिए नोट बांटे जा रहे हैं। पर पब्लिक कितनी समझदार हो गई है? नोट किसी से लिए, वोट किसी और को दे दिया।

पुड्डचेरी में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं हुआ इसलिए सीधे केरल चलते हैं। वाम मोर्चा वहां चुनाव हार गया पर वी.एस. अच्युतानंदन दिल की बाजी जीत गए। कहते हैं। उनकी पत्नी पति के इस रुतबे के बावजूद आज भी सिटी बस में सफर करती हैं और कामरेड अच्युतानंदन के रहन-सहन में पिछले पांच दशकों में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है।

फिर यह लड़ाका महज कुछ सीटों से कैसे हार गया? साफ है। वाम मोर्चा के अंदर दरारें थीं। चुनाव से ऐन पहले तक खुद मुख्यमंत्री का टिकट निश्चित नहीं था। इसके बावजूद अच्युतानंदन ने निजी प्रतिष्ठा तो बचाई ही, साथ ही वाम दलों के जहाज को समूचा डूबने से बचा लिया।

असम में तरुण गोगोई की सत्ता में तीसरी बार वापसी एक कर्मठ जन सेवक की जीत है। दो बार जीतने के बावजूद वे अलसाए नहीं, काम में जुटे रहे। उग्रवादी गुटों को उन्होंने ताकत से नहीं बल्कि बुजुर्गो की तरह समझा-सिखा कर मुख्यधारा में लौटाने का काम किया। जिस कांग्रेस पर कभी आरोप था कि वह पड़ोसी देश से घुस आए खास वर्ग के मतदाताओं को संरक्षण देती है, उनके खिलाफ भी गोगोई खड़े हुए। इसीलिए उनकी जीत असमिया पहचान और स्वाभिमान की जीत है।

अंत में पश्चिम बंगाल। सब जानते थे। दीदी लोकप्रियता के रथ पर सवार हैं। अपने ही काडर के गुलाम और लंगड़े विचार-रथ पर सवार वामपंथियों ने 34 साल के शासन से लोगों को उबा दिया था। यह उनकी हार से ज्यादा परिवर्तन कामना की जीत है। बाकी चार राज्यों में विजेताओं को इतना कड़ा इम्तिहान नहीं देना पड़ा।
उन्होंने सत्ता और काडर के जानलेवा समीकरण से लगातार लोहा लिया। कई बार हारीं, पिटीं और अपने लोगों को खून से तरबतर देखा। पर न हारीं, न थमीं। संयोग देखिए। उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। काडर से जंग जारी रहेगी और जनाकांक्षाओं के ज्वार पर भी सवारी करनी होगी। उन्होंने पथरीले रास्ते पर चलकर कांटों का ताज पहना है।

इन पांच राज्यों में रहनेवाले लगभग 23 करोड़ नर-नारियों की भावनाएं साफ हैं। वे सुशासन, पारदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला नेतृत्व चाहते हैं। इसके लिए उन्हें तरुण गोगोई को तिबारा जिताने में या लगातार सात बार से जीत रहे वामपंथियों को हराने में कोई हिचक महसूस नहीं हुई। इससे पहले कई राज्यों में हम नाम के ऊपर काम की जीत देख चुके हैं।
 
दिल्ली में बैठे राष्ट्रीय पार्टियों के आकाओं को भी ये जनादेश कड़ा संदेश देते हैं। अब वही लोग जनता के द्वारा जिताए जाएंगे जो जनता के बीच रहकर जनता के लिए काम करते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र में इलाकाई ताकतों की वापसी का भी दृढ़ संकेत है। यदि उन्होंने इस इशारे को अभी नहीं समझा है तो आनेवाले चुनावों में नये झटकों और सदमों के लिए खुद को तैयार रखें। तकलीफ कम होगी।

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