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एक साथ परीक्षा और प्रशिक्षण ने बढ़ाया पिंकी का हौसला

करीब दो साल पहले लोगों ने पिंकी जांगड़ा का नाम पहली बार सुना। जमशेदपुर में राष्ट्रीय चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में उनका मुकाबला तब चार बार की विश्व चैंपियन एम.सी. मैरी कोम से था। मैरी काम के खिलाफ मिली उस जीत ने जैसे पिंकी के जीवन की दिशा ही बदल दी। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि अब जो भी करना है, बॉक्सिंग में ही करना है।

ऑस्ट्रेलिया के डार्विन में हुए अराफुरा गेम्स में स्वर्ण जीत कर पिंकी रविवार को भारत लौटी हैं। जिन खेलों में दुनिया के नंबर-वन मुक्केबाज विजेंदर और बीजिंग ओलंपिक के क्वार्टर फाइनलिस्ट अखिल सिर्फ कांस्य जीत पाए, वहां स्वर्णिम सफलता मिलने का मतलब समझा जा सकता है।

पिंकी के पिता हिसार में जिला आयुक्त के कार्यालय में कानूनगो हैं। दो भाइयों ने बी-टेक किया है और अच्छी नौकरियां कर रहे हैं। पिंकी खुद भी पढ़ाई में अव्वल रही हैं। 10वीं में 84 प्रतिशत, 12वीं में 80 प्रतिशत अंक इसका प्रमाण है। हाल ही में उन्होंने बी.ए. फाइनल की परीक्षा दी है और पूरा यकीन है प्रथम श्रेणी में पास होंगी। पटियाला में मुक्केबाजी कैंप के दौरान उन्होंने परीक्षा की तैयारी की।

परीक्षा वाले दिन वह सुबह 9 बजे पटियाला से चलतीं और दोपहर में हिसार पहुंचतीं। परीक्षा देतीं और उसी दिन वापस पटियाला लौट जातीं। पिंकी कहती हैं, ‘परीक्षा के लिए मुझे कैंप से छुट्टी नहीं मिली। इसलिए मैं रोज परीक्षा देने जाती और शाम को वापस पटियाला पहुंच जाती और फिर मुक्केबाजी की प्रैक्टिस में जुट जाती।’ 

अराफुरा खेलों में पिंकी ने गोल्ड जरूर जीता, लेकिन करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मैरी कोम के खिलाफ मिली जीत को ही मानती हैं। वह कहती हैं, ‘मैरी कोम को जिस दिन हराया, उतनी खुशी इस गोल्ड को जीतने पर भी नहीं मिली।’

राष्ट्रीय चैंपियन पिंकी ने अपने भाई अमित को देख कर मुक्केबाजी शुरू की थी। भाई ने तो मुक्केबाजी छोड़ दी और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गया, लेकिन बहन ने मुक्केबाजी को ही करियर बना लिया। महिला मुक्केबाजी के राष्ट्रीय कोच अनूप कहते हैं, ‘पिंकी अच्छी मुक्केबाज हैं। 2004 से हिसार साई सेंटर में हैं।’

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