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परिवार के नाम पर आज जहां ‘हम दो हमारे दो’ ही जानते हैं वहां समाज के सामने मिसाल पेश करता एक परिवार ऐसा भी है जिसमें एक-दो या दस नहीं पूरे 65 सदस्य एक ही छत के नीचे एक साथ रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि बाहर से यह परिवार एक दिखता हो और घर के अन्दर चूल्हे अलग-अलग हो बल्कि यह पूरा परिवार एक ही चूल्हे में बना खाना खाता है।

इस चौके की जिम्मेदारी घर की एक दर्जन महिला सदस्यों पर है। रोजी-रोजगार की तलाश में घर से बाहर रहने के कारण लोग दादा-दादी, चाचा-चाची की डांट-डपट तथा भइया-भाभी की हंसी-ठिठोली से महरूम होते जा रहे हैं। धीरे-धीरे लोगों को एकल परिवार रास आने लगा है। ऐसे में गोला ब्लाक के देवकली (कुड़वा आम) की अकाली देवी का परिवार प्रेम, सहयोग, त्याग, संस्कार और अटूट विश्वास की जीती जागती मिसाल है।

इस परिवार में 65 लोगों की कमान अस्सी वर्षीया वृद्धा अकाली देवी सम्भालती हैं। बड़हलगंज, कौडीराम व झुमिला बाजार संवाद के अनुसार परिवार में शामिल दो भाइयों के नौ बेटों का भरा पूरा कुनबा एक साथ हंसता-रोता है, जागता -सोता है, हर छोटी बड़ी समस्या का समाधान एक चटाई पर बैठकर ढूंढ़ता है। दु:खी यादव के दो बेटे रामनवल तथा रामकंवल क्षेत्र में राम-लक्ष्मण की जोड़ी के नाम से मशहूर थे।

दुखी की मौत के बाद बड़े बेटे रामनवल ने मुखिया का दायित्व निभाया व छोटे भाई रामकंवल को नहर विभाग में क्रेन आपरेटर की नौकरी मिल गई। रामकवल ने इकलौते बेटे के रहते हुए भी बेरोजगार बड़े भाई रामनवल के आठ बेटों की परवरिश को तरजीह दी और कमाई की एक-एक पाई बड़े भाई के हाथ पर लाकर रखी। रामकवल ने अपने बेटे दीनानाथ के साथ-साथ रामनवल के आठ बेटों इन्द्रजीत, जगदीश, रामानन्द, श्रवण, सुदामा, प्रहलाद, रामअवतार तथा रविन्द्र को अच्छी शिक्षा दिलाई।

जिसकी बदौलत इन्द्रजीत को सिंचाई विभाग मे इंजीनियर, जगदीश को सरकारी ड्राइवर की व रविन्द्र को प्राथमिक अध्यापक की नौकरी मिली। रामानन्द, श्रवण, प्रहलाद तथा रामअवतार गुजरात के भावनगर में रहते है मगर उनका परिवार घर पर ही रहता है। पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने के लिए ही जगदीश ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। बीडीसी सदस्य सुदामा तथा शिक्षक रविन्द्र यादव घर पर रहकर परिवार की और सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं।

रामनवल की मौत के बाद उनकी पत्नी अकाली देवी ने परिवार के मुखिया का दायित्व सम्हाला। किसी भी मसले पर अन्तिम निर्णय चाचा रामकंवल व एवं माताजी ही लेते हैं। परिवार में नौ भाई, चाचा, माताजी, भाइयों के 25 पुत्र और उनके पुत्र एवं पुत्रियों सहित कुल 64 लोग रहते हैं। युवाओं की भी सुनिए संयुक्त परिवार ही बेहतर-रोमी सिंह, नौकरीपेशा इतिहास और संस्कृति को जानना है तो हमें संयुक्त परिवार के महत्व को जानना होगा।

संयुक्त परिवार में जो बड़े बुजुर्गो की डांट, प्यार, सीख, सम्मान, विश्वास और भरोसा होता है जिसका कोई सानी नहीं है। जिस दौर से हम गुजर रहे हैं वहां पर संयुक्त परिवार की अहमियत और बढ़ जाती है। लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उससे बढ़ता मानसिक तनाव, सब झंझटों से मुक्ति संयुक्त परिवार में ही मिल सकती है। क्योंकि वहां माता-पिता के अलावा भी हमारा ख्याल रखने वाले होते हैं।

हम कितनी भी गलितयां क्यों न करें वह हमें प्यार से समझाते हैं और दिग्भ्रमित नहीं होने देते। एकल परिवार में यह सब कहां है। वहां तो केवल पति पत्नी और बच्चों। संयुक्त परिवार का अनुभव अद्भुत- वैभव शुक्ल, नौकरीपेशा मेरी नजर में संयुक्त परिवार ही बेहतर है। सबसे ज्यादा तो इमरजेंसी में इसका फायदा दिखता है। घर में कोई बीमार हो जाए या कोई दुर्घटना घट जाए या फिर कोई कोई खुशी का क्षण हो, सभी मिलकर एक दूसरे से सुख-दुख शेयर करते हैं।

संयुक्त परिवार में एक दूसरे की सारी जरूरतें भी पूरी होती हैं। एकल परिवार में केवल तनाव ही तनाव है। यदि माता पिता दोनों कामकाजी हैं तो बच्चों को अकेले ही वक्त गुजारना पड़ता है। इससे कभी-कभी बच्चों का विकास बाधित होता है पर संयुक्त परिवार में ऐसा नहीं है। माता पिता के अलावा अन्य रिश्तों में हुई परवरिश से बच्चों में उसके संस्कार दिखाई पड़ते हैं।

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  • Web Title:80 की अकाली देवी के हाथ 65 सदस्यों की डोर