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थम गए बंगाल की बदलती हवा

परिवर्तन। 34 साल बाद लेफ्ट का सूपड़ा साफ हुआ है। 34 साल लंबा वक्त होता है। एक पूरी पीढ़ी इस दौरान पैदा हुई, जवान हुई और अब प्रौढ़ होने को है। इस पीढ़ी ने लेफ्ट के अलावा कुछ देखा ही नहीं। दुनिया के नक्शे से मार्क्सवाद गायब हो गया, सोवियत संघ खंड-खंड हो गया। सोवियत रूस, जिसकी एक घुड़की पर अमेरिका की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी, एक मामूली-सा देश रह गया।

पूर्वी यूरोप के मार्क्सवादी तानाशाह तिनके से उड़ गए। और सबसे बड़ी बात, जो मार्क्सवाद कभी फैशन हुआ करता था, प्रगतिशीलता का पैमाना था, वह आउटडेटेड, दकियानूस, जड़ता का प्रतीक बन गया। बस नहीं बदला, तो भद्र पुरुषों का पश्चिम बंगाल। वह बंगाल, जिसके बारे में कहा जाता था कि जो वह आज सोचता है, पूरा देश बाद में सोचता है। उसे अपनी सोच में बदलने में 21 साल लग गए। 23 साल पहले पश्चिम बंगाल में कोई लेख वॉलेसा पैदा क्यों नहीं हुआ? जब रोमानिया में चाउशेस्क्यू को बीच सड़क पर गोली मारी गई, तो इस घटना के महज एक महीने पहले इसी चाउशेस्क्यू की तारीफ में पोथन्ना लिखने वाली जनवादी सीपीएम को समझने में अग्रगामी पश्चिम बंगाल को इतना समय क्यों लगा?

दरअसल, बंगाल अपनी ऐतिहासिक लीडरशिप की भूमिका को पिछले दिनों भूल गया था। राजनीतिक स्तर पर भी, और सांस्कृतिक स्तर पर भी। लेफ्ट की राजनीति और कांग्रेस की गलत नीतियों ने उसे जड़तावादी बना दिया। सांस्कृतिक स्तर पर वो रवींद्र संगीत से आगे नहीं बढ़ पाया और राजनीतिक स्तर पर उसे सिद्धार्थ शंकर राय के शासन के दिए घाव ने बाहर निकलने नहीं दिया।

60 के अंतिम और 70 के शुरुआती वर्षो में नक्सलवादी हिंसा से निपटने का जो हिंसक तरीका कांग्रेस की सरकार ने निकाला था, उसे किसी भी सभ्य समाज में जायज नहीं ठहराया जा सकता। एक पूरी युवा पीढ़ी को ‘ब्रूटलाइज’ किया गया। यह इत्तफाक नहीं है कि जेपी आंदोलन का सामना करने के लिए देश में इमरजेंसी लगाने की सलाह देने वाले सिद्धार्थ शंकर राय ही थे।

घाव इतने गहरे थे कि पश्चिम बंगाल को हर कांग्रेसी में सिद्धार्थ शंकर राय ही नजर आता था। सीपीएम की किस्मत अच्छी थी कि उसके पास ज्योति बसु जैसे नेता थे, जो मार्क्सवादी जरूर थे, लेकिन मिजाज व स्वभाव में व्यवहारवादी। वह बाहर से सीपीएम के अनुशासन से बंधे थे, लेकिन सोच के स्तर पर उन्होंने अपने निजी-मार्क्सवाद को जड़ नहीं होने दिया। जैसे माओ ने सोवियत रूस के लेनिन से प्रेरणा तो ली, लेकिन हूबहू नकल नहीं की।

उन्होंने मार्क्सवाद का विस्तार किया, चीन की आबोहवा से उसकी जान-पहचान कराई, चीन की जमीनी हकीकत को सामने रखकर उसके बीज बोये। मार्क्सवादियों को राष्ट्रवाद से बहुत चिढ़ होती है। उन्हें लगता है कि राष्ट्रवाद एक नकारात्मक सोच है, लेकिन ज्योति बसु ने सीपीएम के मार्क्सवाद को बंगाल की अस्मिता से जोड़ दिया। 

बंगाली राष्ट्रवाद सीपीएम की पहचान हो गई। वैसे ही, जैसे आजकल नरेंद्र मोदी बीजेपी को गुजराती अस्मिता से जोड़ रहे हैं। मार्क्सवाद और बंगाली राष्ट्रवाद की इस खिचड़ी को सीपीएम के संगठन ने घर-घर पहुंचा दिया। सिर्फ मार्क्सवाद होता, तो बंगाल का आदमी राजनीति में सीपीएम की दखल को बर्दाश्त  करता, पर समाज पर उसका कब्जा कभी नहीं होने देता।

पश्चिम बंगाल में पिछले 34 साल में दरअसल हुआ यह कि सीपीएम ने लोकतंत्र के बावजूद राजनीति और समाज, दोनों को अपने नियंत्रण में ले लिया। जो बंगाल से परिचित हैं, उन्हें बताने की जरूरत नहीं है कि सीपीएम की मुहल्ला कमेटी यह तो तय करती ही थी कि आम वोटर को किसे वोट देना है, वह समय के साथ ये भी तय करने लगी की आम मानुष के घर में क्या होगा? बच्चा किस स्कूल मे पढ़ेगा? बड़ा होकर कहां नौकरी करेगा? जमीन कहां खरीदेगा? यहां तक कि वह मियां-बीवी के झगड़े भी सुलझाने लगा।

ये पूरा मॉडल सोवियत रूस और चीन की तर्ज पर था, जहां आम आदमी की जिंदगी पर सिर्फ मार्क्सवादी पार्टी का अधिकार था, उसे पार्टी हित से अलग सोचने की इजाजत नहीं थी। हिन्दुस्तान का लोकतंत्र इस तरह के एकाधिकारवाद की इजाजत नहीं देता। लेकिन लोकतंत्र की आड़ मे सीपीएम ने इसके नरम रूप को अमली जामा पहना दिया। हकीकत में बंगाल में लेफ्ट के इतने लंबे शासन का यह सबसे बड़ा कारण बना। 
 
यह सही है कि इस दौरान बंगाल में देश में सबसे अच्छी तरह से भूमि सुधार कानून लागू किया गया। कृषि के क्षेत्र में आज वह देश में अव्वल है। चावल, सब्जी, मछली आदि के उत्पादन में देश में नंबर एक। सांप्रदायिक सौहार्द सबसे बेहतर। पर इतने लंबे शासन के बाद बंगाल की तकदीर बदलनी चाहिए, वह नहीं बदली। वह देश का सबसे पिछड़ा राज्य हो गया।

शहरी बेरोजगारी का आंकड़ा अगर देश मे 8.3 प्रतिशत है, तो बंगाल में 9.9 प्रतिशत और जिन राज्यों में बच्चों की ड्रॉप आउट दर सबसे ज्यादा है, उन राज्यों में बंगाल सातवे नंबर पर है। 1975-77 में मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में 19 प्रतिशत के आंकड़े के साथ वह गुजरात के साथ पहली पायदान पर था। आज गुजरात का आंकड़ा 30 प्रतिशत हो गया, लेकिन बंगाल में घटकर 7.4 प्रतिशत रह गया। राज्य पर 1,68,684 करोड़ रुपये का कर्ज है। 

ऐसे में, जब पार्टी की विचारधारा के उलट बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगीकरण को पटरी पर लाने के लिए जमीन अधिग्रहण नीति पर चलने का फैसला किया, तो सिंगूर-नंदीग्राम हो गया और पार्टी के ही नेता कहने लगे कि बुद्धदेव को तो पानी का सांप मारना नहीं आता और वह कोबरा मारने चले हैं।

जिस दौरान आम बंगाली अपने पिछड़ेपन से जूझ रहा था, उसी दौर में देश दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। बंगाल को अपनी बदहाली दिखी, उसका कारण दिखा, वह भी बदलने को मचल उठा। पर जब उसे वैचारिक दिशाहीनता में फंसी सीपीएम में पुरानी मानसिकता से निकलने का जज्बा नहीं दिखा, तो उसने तौबा करने का मन बना लिया। ममता सही समय पर मौजूद थीं। सही राजनीति कर रही थीं। वरना तमाम ड्रामे करने वाली को बंगाल कई बार नकार चुका था। ममता देर से बदले बंगाल का पड़ाव भर हैं, अंतिम मुकाम नहीं। बंगाल में असल परिवर्तन तो अभी आना बाकी है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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