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हमास-फतह सुलह की पेचीदगियां

लीबिया, सीरिया और अरब जगत के कुछ अन्य देशों में जनांदोलन की आग फैलने के बीच प्रतिस्पर्धी फलस्तीनी गुटों- हमास और फतह के बीच एकता के समझौते की घोषणा हैरत में डालने वाली है। सर्वाधिक बेचैन इजरायल है, जबकि अमेरिका अब भी अपना रुख तय नहीं कर पाया है। इस समझौते के मुताबिक, अगले एक साल में फलस्तीन में चुनाव कराने के लिए गैर-राजनीतिक लोगों की अंतरिम सरकार गठित की जाएगी और लक्ष्य है- येरूशलम में राजधानी के साथ वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में फलस्तीनी राज्य की स्थापना।

मिस्र में जन-बगावत के बाद उसकी अंतरिम सरकार द्वारा यह समझौता करवाने से जाहिर होता है कि अमेरिका-प्रायोजित शांति वार्ता की नाकामी के बाद निराश फलस्तीनी अपने साथी अरब देशों की ओर अधिक मुखातिब हो रहे हैं।

यह समझौता मिस्र की भावी नीति, उसके बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव और उसके द्वारा इजरायल के सामने पेश की जाने वाली चुनौतियों की ओर भी संकेत करता है। खबर यह भी है कि मिस्र इजरायल के साथ प्राकृतिक गैस समझौते पर पुनर्विचार कर रहा है। अरब जगत के नेता के रूप में मिस्र की मुखरता पर अमेरिका हैरान है, क्योंकि पहले उसकी  पश्चिमी देशों के साथ साङोदारी थी।मिस्र की नई सरकार गाजा पट्टी से सटी अपनी सीमा खोलने की योजना बना रही है, जिससे इजरायल चिंतित है।

हमास और फतह के बीच मेल-मिलाप दोनों गुटों द्वारा व्यावहारिक नजरिया अपनाने का नतीजा है। फतह गुट के नेतृत्व वाला फलस्तीनी प्राधिकरण इजरायल के साथ समझौता करने में नाकाम रहा और इजरायल द्वारा यहूदी बस्तियां बसाने के खिलाफ पिछली फरवरी में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिकी वीटो के बाद फलस्तीनियों की निराशा बढ़ गई थी।

दूसरी ओर, हमास का पोलित ब्यूरो सीरिया में है। यदि सीरिया में बशर अल-असद की सरकार गिरती है, तो हमास को उससे मिलने वाली सुरक्षा, धन और शस्त्र सप्लाई बंद हो जाएगी। शायद इसी सोच के तहत हमास ने फतह के साथ समझौते का रुख अपनाया। हालांकि फतह का यकीन धर्मनिरपेक्ष विचारधारा में है, जबकि हमास एक इस्लामी कट्टरपंथी गुट है। 2006 के संसदीय चुनाव में हमास की जीत के बाद उनके संबंधों में बिगाड़ आया था। एक साल बाद यह फूट तब और बढ़ गई, जब हमास ने गाजा पट्टी पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और फतह की सेना को खदेड़ दिया।

बहरहाल, एकता के समझौते से फलस्तीनी राज्य की स्थापना की नई आशाएं जगी हैं। लेकिन, एकता की घोषणा और उसे व्यवहार में लाना, दो अलग-अलग बातें हैं। दूसरी तरफ, इस समझौते से अगर कोई व्यवस्था निकलती है, तो उसके प्रति अमेरिका और पश्चिमी देशों का क्या रवैया होगा, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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