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सपने देखने के बाद का सच

प्रजातंत्र शर्तिया जन-शासन का सबसे शानदार विकल्प है। जनतंत्र का सबसे आकर्षक और जनोपयोगी पक्ष उसमें होने वाले चुनाव हैं। जाने क्यों, हर इलेक्शन के वक्त हमें भाई बुद्धिनाथ की कविता, ‘एक बार जाल और फेंक रे, मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’ का ध्यान आता है। मछेरे के अवतार में नेता की कल्पना मनोरंजक लगती है। कैसे जनता को वह वायदे, प्रलोभन, विकास, सड़क, अस्पताल, स्कूल, नहर, पुल वगैरा के चारे से फंसाता है। एक बार फंसी नहीं कि वह काट-कूटकर उसे बेचने के लिए तैयार हो जाता है। यही उसकी रोजी-रोटी है। धंधा है।

यह कविता हर चुनावी परिदृश्य पर सटीक ही नहीं बैठती, ज्ञानवर्धक भी है। जनता को नेता से वायदा-खिलाफी की शिकायत का क्या अधिकार है? यह तो मछली की गलती है कि वह फंसी क्यों? जब फंस ही गई, तो उसकी नियति ही टुकड़े-टुकड़े होना, और बिकना है। फिर कैसी वायदा-खिलाफी, कौन-से झूठे प्रलोभन! हर कामयाब नेता सिर्फ मछेरा ही नहीं, सपनों का सफल सौदागर भी है। जनता ने सपने देखे, नेता ने दिखाए। हिसाब बराबर।

अभी-अभी कुछ राज्यों में सपने बेचने का सिलसिला खत्म हुआ है। सबसे लुभावने सपने दिखाने वाले मछेरे को कामयाब होना ही होना है। देखें, इन सूबों के पोखर की मछलियों पर आगे क्या बीतती है? हम भी सपने देखने, उन पर भरोसा करने के भुक्तभोगी हैं। अपने शहर में कानून-व्यवस्था की तरक्की का आज यह आलम है कि पहले एक उठता था, अब दस उठते हैं। पहले एक-दो घंटे पानी आता था, आज एक-दो बूंद के लिए तरसते हैं। 

बिजली का कहना ही क्या? वह तो छुई-मुई है, किसी मौसम की उंगली लगी नहीं कि चल बसी। अपन इतना जानते हैं कि एक भी लीडर ऐसा नहीं है, जो बिना पावर चैन से गुजारा कर ले। जाने क्यों, इसके वाबजूद, उसे खुशफहमी है कि जनता को सब सहने की आदत होनी चाहिए। पावर हो तब भी ठीक है, न हो तब भी ठीक है। चुनाव में बिजली-पानी के सपने देख लिए। क्या इतना काफी नहीं है? पंखा बंद है, तो क्या गम है? ऐसे में ही तो इंसान कुदरत से जुड़ेगा।

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