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मेरे अपने, मेरे लोग..

पिताजी (आनंद बख्शी) की आमदनी इतनी नहीं थी कि शादी के बाद वह मुंबई में घर किराये पर लेते। इसलिए शादी के बाद भी कुछ सालों तक मेरी मां उनके माता-पिता के घर में ही रहती थीं, लखनऊ  में। वो महिलाओं के कपड़े सीती थीं, ताकि अपने पिता को, जो एक रिटायर्ड आर्मी मैन थे, कुछ आर्थिक मदद कर सकें। एक दिन जब मैं मेरी माताजी के साथ गुस्से से पेश आया, तब पिताजी ने मुझे बताया कि बचपन में मेरी मां अंडे इसलिए नहीं खाती थीं, ताकि हम बच्चों को अंडे खाने को मिलें।

उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि अच्छा नाश्ता कर पाते। इसलिए मेरी माताजी ने काफी त्याग किए अपने चार बच्चों को बड़ा करने के लिए। पिताजी ने उस दिन हम बच्चों को आगाह किया और चेतावनी भी दी कि हम कभी अपनी मां के साथ बदतमीजी से पेश न आएं। पिताजी के स्थापित होने के बाद और अमीर बनने के बाद भी मां अपनी पुरानी साड़ियों को पहनना नहीं छोड़ीं, क्योंकि वह जानती थीं कि पिताजी जो कमाते थे, उसकी कीमत क्या थी।

..पिताजी की मृत्यु के बाद प्रेस वाले हमारे घर के अंदर शूट करना चाह रहे थे। पिताजी के पार्थिव शरीर को हमारे लिविंग-रूम में रखा गया था। हमने मां से पूछा कि क्या हमें प्रेस को शूट करने की अनुमति देनी चाहिए, तब उन्होंने कहा कि पिताजी अपनी पूरी जिंदगी प्रेस और पब्लिसिटी से दूर ही रहे, ताकि उनका ध्यान लेखन से न हट जाए, और अब जब वे घर आना चाह रहे हैं, तो यह तुम्हारे पिताजी की उपलब्धि है और यह उनका हक भी है, इसलिए उन्हें आने दो।                                

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