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अशांति से शांति की ओर

सभी शांति चाहते हैं। लेकिन सिर्फ चाहने से शांति मिलेगी नहीं। चाह इतनी तीव्र हो कि आचरण बन जाए, तभी शांति की किरण उतर सकती है। अधिकतर लोग कुनकुने -कुनकुने जीते हैं, पूरी शक्ति लगाकर जीना नहीं जानते। लेकिन वैज्ञानिक तथ्य यह है कि जब तक आप पूरी तरह एक अति पर नहीं जाते, तब तक रूपांतरण नहीं हो सकता। जैसे पानी सौ डिग्री पर उबले, तभी भाप बन सकता है। सत्तर, अस्सी या नब्बे डिग्री पर भी गरम पानी ही बना रहेगा। यही बात लागू होती है मानसिक संवेगों पर।

अशांति एक प्रकार की ऊर्जा है और शांति दूसरी तरह की ऊर्जा है। यदि एक ऊर्जा का दूसरी ऊर्जा में रूपांतरण करना हो, तो एक को अति पर ले जाना जरूरी है। अशांति हमारी सामान्य स्थिति है। लेकिन इसे अगर शांति में बदलना है, तो कुछ करना पड़ेगा, सिर्फ सोचने से काम नहीं चलेगा। ओशो का नुस्खा यह है कि शांति प्राप्त करनी हो, तो पूरी तरह अशांत हो जाइए। चौंक गए न? लेकिन यही सच है। आत्म-रूपांतरण अति पर ही संभव होता है। जब तक हम जीवन की एक शैली के आखिरी छोर पर न पहुंच जाएं, जब तक हम उसकी पीड़ा को पूरा न भोग लें, उसके संताप को पूरा न सह लें, तब तक रूपांतरण नहीं होता।

हममें से कोई भी पूरा अशांत नहीं होता, हम थोड़े अशांत होते हैं। जब हम सोचते हैं कि असहनीय हो गई है दशा, तब भी दरअसल वह सहनीय ही होती है, असहनीय नहीं होती। क्योंकि असहनीय का तो अर्थ है कि आप बचेंगे ही नहीं। सचमुच शांति की तलाश है, तो हमें अपनी अशांति की तह तक पहुंचना होगा। जब मन उद्विग्न हो, तो सारे काम बंद करके कुछ देर के लिए इस उद्विग्नता को देखिए। इसके कारण जो अंधेरी बोझिलता छा गई है भीतर, उसमें उतरिए। धीरे-धीरे आपको पता चलेगा कि इसका कारण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, आप खुद हैं। इस तथ्य को देखते ही आपकी अशांति शांति में गति से बदलने लगेगी।                            

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