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सूरज की छाती पर आग का दरिया सोलर सुनामी

यह मानव की तकनीकी तरक्की का बेहतरीन नमूना है कि सूरज में हो रही उथल पुथल की जांच के लिए उस तक पहुंचने की तैयारी की जा चुकी है। अमेरिका द्वारा कार के आकार का एक ‘सोलर प्रोब प्लस’ यान तैयार कर लिया गया है। यान को सूरज के नजदीक पहुंचाया जाएगा जो 64 लाख किलोमीटर की दूरी तक पहुंचते ही सूरज के सीने में तेज छलांग लगाएगा और उसके वायुमंडल में पहुंच खोज खबर लेगा।

कैलिफोर्निया स्थित नासा की जेट कंपल्शन प्रयोगशाला की हालिया रिपोर्ट के अनुसार सोलर प्रोब प्लस मूल रूप से सूरज में उठती सोलर विंड यानी सौर पवन के निर्माण के कारणों की जांच करेगा, साथ ही यह भी जानकारी लेगा कि सूर्य का बाह्य वायुमंडल यानी कोरोना उसकी सतह की अपेक्षा अधिक गर्म क्यों रहता है। जाहिर है स्वयं इस यान को सूरज के भीषण तापमान का सामना करना पड़ेगा। इसी को देखते हुए इसका निर्माण विशेष कार्बन-संकुल शीट से किया गया है।

इसी श्रृंखला में गत माह अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा की वेधशाला सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी ने सूरज के जिगर में झांका तो सूरज का क्रोध नजर आया। यह था सोलर सुनामी। सूरज की सतह पर बहता आग का दरिया वैज्ञानिकों के लिए गहन सोच और गंभीर खतरे का सबब बना रहा है। गत दिनों इसी को उजागर करती रिपोर्ट आई है। मगर 15 मार्च 2011 को नासा के वैज्ञानिकों का माथा तब ठनका जब उन्होंने अपनी अति संवेदी स्टीरियो वेधशाला यानी सोलर टेरेस्ट्रियल रिलेशंस आब्जर्वेटरी से इस घटना की सत्यता को देखा। बाद में इसकी पुष्टि सोलर सुनामी के रूप में हुई।

धरती से भी ऊंची सुनामी लहर
अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि हमें गोल दिखाई देता चमकता सूरज एकदम भिन्न है। इसके भीतरी प्रकोष्ठ में चुंबकीय तरंगें हैं जो लगातार बाहर आने को बेताब हैं। वहीं इसके अंदर की गैसें इसे बाहर आने से रोकती हैं। मगर एक दशा वह भी आती है जब यह बांध टूट जाता है और भीषण लपटें यानी महाज्वालाएं बाहर आने लगती हैं। एक मामूली महाज्वाला भी सौ मेगाटन शक्ति वाले लाखों हाइड्रोजन बम के विस्फोट के बराबर ऊर्जा अंतरिक्ष में बिखेर देती है।

नासा के गाडर्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार जिस सोलर सुनामी पर तर्क-वितर्क हो रहे थे, वह अब सच्चाई के रूप में है। यहां की सोलर फिजिक्स लेबोरेटरी के भौतिकशास्त्री डॉ. जो गुरमन के अनुसार जिसे हम किसी उपग्रह की छाया मानते रहे वह असल में लहर रूप लिए सोलर सुनामी ही है। इसकी पुष्टि करते हुए जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के डॉ़ स्पायरोस पेटरोयूरेकोस कहते हैं कि यह ‘हॉट प्लाज्मा’ यानी गर्म लावा का रूप है जो लहरों के रूप में उठ रहा है जो पूरी तरह से सोलर सुनामी ही है। स्टीरियो वेधशाला द्वारा 90 डिग्री के कोण पर दो भीषण अग्नि लहरों को देखा गया जो वाकई में सोलर सुनामी है।

संचार पर होगा प्रहार
वैज्ञानिकों ने धरतीवासियों को ढाढ़स बंधाते हुए कहा है कि सोलर सुनामी का कहर सीधे धरती पर अधिक नहीं पड़ेगा। हां, इसके प्रभाव से पृथ्वी का दूरसंचार माध्यम आवरण प्रभावित होगा। विशेष तौर पर मोबाइल का प्रयोग डगमगा जाएगा। दूरदराज से मोबाइल पर आते संदेश बुरी तरह से प्रभावित होंगे तो वहीं नेट की चाल धीमी पड़ जाएगी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्ष 2012 में औरा यानी उत्तरी क्षेत्र प्रकाश अपने उच्चतम रूप में होगा और गरमाहट की अति सामने आएगी। वर्ष 2008 में इससे जुड़ी दशा को अधिकतम माना गया था, मगर वर्ष 2012 में यह दशा वर्ष 1958 से लेकर अब तक की भीषणतम स्थिति होगी। वैज्ञानिकों का दावा है कि सूरज से गरमाहट लिए कण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाएंगे और उसमें उथल-पुथल मचाएंगे। इस तरह से संचार की सुदृढ़ व्यवस्था पर चोट होगी और उससे जुड़े अत्यंत संवेदी उपकरण भी प्रभावित होंगे।

दूसरी ओर इस बात की भी पुष्टि की जा रही है कि जब सूरज से निकलती ज्वालाएं महाज्वाला के रूप में गुर्राती हैं तो सूरज की सक्रियता में कई गुना बढ़ोत्तरी हो जाती है। शोध रिपोर्ट के अनुसार यह विकिरण का विकराल रूप है जो इलैक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी यानी विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा है। इसमें गामा किरणों, एक्स किरणें और पराबैंगनी किरणें भरी रहती हैं। इस तरह से इनका धरती के वायुमंडल पर थोड़ा भी प्रभाव उसके संचार को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त होगा।

ओजोन की छितराती छतरी
शोध बताते हैं कि ऊष्मा लिए सूर्य की किरणें पृथ्वी के वातावरण में धीरे-धीरे और विभिन्न स्तर पर ऊर्जा छोड़ती जाती हैं। सूर्य का विकिरण जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है तो एकदम तली तक नहीं पहुंचता। इसका कुछ भाग तो धूल के कणों व बादलों से परावर्तित हो जाता है जबकि अन्य कार्बन डाई आक्साइड, जलवाष्प और ओजोन परत द्वारा सोख लिया जाता है। इस तरह से सूर्य भी अपने रथ यानी किरणों पर सवार हो ऊष्मा के जिस भीषण स्वरूप को लेकर आता है वह धरती तक पहुंचते-पहुंचते बहुत कम मात्र में रह जाती है।

अगर पृथ्वी के वातावरण में ओजोन न हो तो सूर्य की पराबैंगनी किरणें समस्त जीवों को झुलसा दें। सूर्य का ताप तब संपूर्ण सागर संपदा में उबाल ला दे जिसका कहर सुनामी लहरों से भी ज्यादा गंभीर हो जाए। ब्रिटिश अंटार्कटिका सर्वे के एलन रोजन के अनुसार, वर्ष 2004 में ओजोन फैलाव में जो छोटा छेद देखा गया था, वह 2006 तक इतना बढ़ चुका था कि एक दशक पहले भी इतना बड़ा न था। एलन की इस बात का भय है कि यह छेद कहर तो ढाएगा ही, इसके भरने में भी आधी सदी का समय लग जाएगा।

विश्व स्तर पर गरमाती धरती और पर्यावरण असंतुलन इसी श्रंखला का खतरा है। वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को देखते हुए आने वाले खतरे को भांप लिया है और चेताया है कि समय रहते हमें कारगर उपाय करने होंगे, वरना ओजोन की यह छितराती छतरी धरती को छिन्न-भिन्न करने में नहीं चूकेगी।

हम भी तैयार हैं
तमतमाए सूरज पर भारतीय सौर वैज्ञानिकों की भी नजर है। भारतीय अंतरिक्ष संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों द्वारा सूर्य की इस चौंकाती क्रिया को देखने के लिए एक उपग्रह परियोजना के तहत एक विशाल दूरबीन स्थापित की जा रही है। अभी इसकी स्थापना के लिए लद्दाख क्षेत्र को चुना गया है। दावा किया जा रहा है कि यह विश्व की सबसे बड़ी टेलिस्कोप होगी। इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के निदेशक प्रो. एस. एस. हसन के अनुसार इस विशाल और अति संवेदी टेलिस्कोप की स्थापना में 150 करोड़ रुपए के व्यय का अनुमान है।

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