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मरकर भी सात लोगों को जिंदगी बांट गई हर्षिता

सत्रह वर्ष की हर्षिता ने दुनिया से विदा होने के बाद सात लोगों को जीवनदान दिया। उसे दुनियादारी की समझ भले ही न हो पर उसकी समझदारी दाद देने लायक है। वह पढ़ने में तेज थी और बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन बीमारी ने इस कदर घेरा कि उसका सपना पूरा नहीं हो सका।

हर्षिता के पेट में कोलाइटिस (अल्सर) हो गया और दो साल तक बीमारी से जूझने के बाद 17 साल की हर्षिता 28 अप्रैल को दुनिया को अलविदा कह गई। बाद में उसकी इच्छा और परिजनों की सहमति से उसकी देह का दान कर दिया गया। उसकी दान की गई किडनी, लिवर, दिल व कॉर्निया ने सात लोगों को नया जीवन दिया है। मृत्यु से पूर्व हर्षिता ने अपने शरीर के सभी अंगों को दान देने के लिए पंजीकरण करवा दिया था। 

परिजनों से सलाह मशविरा कर, उसके अंगों को प्रत्यारोपित करने का फैसला लिया गया। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उसने आखिरी सांस ली। अस्पताल के चेयरमैन डॉ. बी.के. राव ने बताया कि हर्षिता के अमाशय में गंभीर अल्सर था। दवाओं का असर लगभग खत्म हो गया था। चिकित्सकों की टीम ने 29 अप्रैल को उसका ब्रेन डेड (मस्तिष्क मृत) घोषित कर दिया था।

उसके बाद उसकी एक किडनी और एक लिवर को सरगंगाराम अस्पताल में ही भर्ती दो मरीजों में प्रत्यारोपित किया गया, दूसरी किडनी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को दे दी गई। दो कॉर्निया एनसीआर की दो महिलाओं को दिए गए। हर्षिता के दिल के वाल्व व सेल्स भी दो मरीजों को प्रत्यारोपित किए जाएगें।

(दिल्ली संस्करण)

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