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जमीन बचानी है तो जमीन पर उतरें

गए हफ्ते देश ने दो अद्भुत घटनाओं को टीवी पर साकार होते देखा। पहली, भट्टा पारसौल में राहुल गांधी का धरना और आधी रात को नाटकीय गिरफ्तारी। दूसरी, पांच राज्यों के चुनाव परिणाम। क्या इन दोनों घटनाओं में कोई संगति है? क्या बदलते वक्त के साथ इनमें राजनेताओं और देश के आम आदमी का नया नजरिया कहीं से झलकता है? मेरा विनम्र उत्तर है- जी हां।

पहले चुनावों की बात करते हैं। ममता बनर्जी क्यों जीतीं? ऐसा क्या हुआ कि दूर से हरा-भरा दिखनेवाला वामपंथ का बरगद अचानक धराशायी हो गया? क्या उसकी जड़ों में दीमक लग गई है? या वह विचारधारा ही अप्रासंगिक हो चुकी है? बात इतनी-सी नहीं है। ममता बनर्जी पिछले 25 सालों से अकेले अपने बूते पर आम आदमी की जंग लड़ रही हैं।

शुरुआती दिनों में वामपंथी उनसे इसलिए जीत जाते थे, क्योंकि उनके पास भी जमीन से जुड़े कार्यकर्ता थे। सत्ता जैसे-जैसे पुख्ता होती गई, उसका नशा भी पुरानी शराब की तरह गहराता गया। आमजान के वामपंथी ‘भद्रलोक’ में तब्दील हो गए। गांव-गांव फैले काडर ने समाज सेवकों की जगह दबंगों के दल का रूप ले लिया। उनके विचार ऐसे वस्त्रों में तब्दील हो गए, जो किसी कोढ़ग्रस्त देह की कुरूपता छिपाने के लिए होते हैं।

उधर ममता अपने मूल्यों को निरंतर गरिमाशील बना रही थीं। इसीलिए उनकी जीत यह संदेश देती है कि अब उनकी नहीं चलनेवाली, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर गरीबी की चर्चा करते हैं। कम्युनिस्टों के घोर विरोधी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी भी इसके अपवाद नहीं हैं।

एक समय था, जब संघ के स्वयंसेवक सुबह-सुबह लोगों के दरवाजे खटखटाते थे और बच्चों को शाखाओं में आने के लिए आमंत्रित करते थे। उन शाखाओं में हिंदू कट्टरवाद की घुट्टी पिलाने की कोशिश की जाती थी, पर यह भी सच है कि इसी बहाने बच्चों को वर्जिश का भी प्रशिक्षण मिलता था। उन दिनों स्वयंसेवक एसी गाड़ियों में नहीं चलते थे। वे विवाह नहीं करते थे और दो जून के भोजन के लिए उन्हें हमदर्दों के घरों में जाना होता था।

1857 की क्रांति में रोटी और कमल भाईचारे और संघर्ष की मिसाल बने थे। यहां रोटी भाईचारे को मजबूत करने का एक जरिया थी। ठीक वैसे ही, जैसे ‘होल टाइमर’ कम्युनिस्ट गांव-गांव घूमकर समाजवाद की अलख जगा रहे थे। एक तरफ कट्टर राष्ट्रवाद के बीज बोए जा रहे थे, तो दूसरी तरफ हरेक की बराबरी का सपना रोपा जा रहा था। दोनों ही विचारधाराएं शीर्ष पर पहुंचीं, पर एक उफान के बाद लड़खड़ा गईं। क्यों?

वजह साफ है। सत्ता ने इनकी धार को भोथरा कर दिया। वामपंथ और दक्षिणपंथ के विचार कायम हैं, पर उन पर यकीन करनेवाले कम हो गए हैं। हमारे देश में आजादी के बाद दुर्भाग्य से सत्ता का लालच हर मिशन को लीलता रहा है। दलित और किसान आंदोलन भी इसकी मिसाल हैं। अंबेडकर ने जो फसल बोई, उसे देश के अलग-अलग नेताओं ने अपने हिसाब से काटा। पर दलितों के सच्चे प्रतिनिधि चेहरे के तौर पर आज तक कोई भी शख्सियत नहीं उभरी। 

जो नेता वंचितों के बीच जन्म लेकर उनके लिए जीने-मरने की कसमें खाया करते हैं, वे सत्ता पाते ही बदल जाते हैं। आतंकवाद ने उन्हें जनता से दूर होने का आधिकारिक बहाना दे दिया है। कई बार सवाल उठा है। नेताओं की जान से ज्यादा क्या उनका कर्तव्य जरूरी नहीं है?

फिर राहुल गांधी के धरने पर आते हैं। वक्त ने राजनेताओं की मानसिकता को बदलना शुरू कर दिया है। पिछली 11 मई को तपती दोपहरी में धरने पर बैठे राहुल को देखकर लग रहा था कि आम आदमी के दर्द ने उन्हें अंदर तक झुलसा दिया है। सब जानते हैं। सूरत एक दिन में नहीं बदलेगी। पर यह भी सच है कि हालात बदलने के लिए ऐसी कोशिशें जरूरी हैं। उस दिन दो बिंब आंखों के सामने उभरे।

सन् 1989 में आगरा जातिवादी दंगों की आग में जल रहा था। राजीव गांधी तब विपक्ष में थे और लोगों को ढाढ़स बंधाने के लिए आगरा जा पहुंचे थे। उनकी मंशा पीड़ितों के घर जाने की थी, पर तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने उनसे कहा था कि उनके जाने से हालात और बिगड़ सकते हैं। राजीव ने बात मान ली और वह अधिकारी उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाकर दूर ले गया था।

संयोग देखिए। राहुल जब उत्तर प्रदेश पुलिस को धता बताकर धरने पर बैठे और उन्होंने वहां से हटने के इसरार को अस्वीकार कर दिया, तब यूपी पुलिस की समूची कमान उसी अधिकारी के हाथ में थी। आज के पुलिस महानिदेशक कर्मवीर सिंह के कहने पर उस दिन आगरा में राजीव तो हट गए थे, पर राहुल डटे रहे।

खुद राहुल कई खूंख्वार आतंकवादी संगठनों के निशाने पर हैं, फिर भी वक्त की मांग पर उन्होंने हिम्मत की। बेहद कम सुरक्षा के साथ वह भट्टा पारसौल पहुंचे। टीवी की लाइव रिपोर्टिंग के बीच घंटों बैठना हादसों को निमंत्रण देना था, पर वह डिगे नहीं।

मौका है, लिहाजा एक और संयोग की चर्चा करना चाहूंगा। 1984 में हेमवती नंदन बहुगुणा ने इलाहाबाद में एक प्रेस कांफ्रेंस में राजीव गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा था, ‘हमें पीपल के पत्ते की तरह कांपता हुआ प्रधानमंत्री नहीं चाहिए।’ बहुगुणा का आक्षेप था कि राजीव सुरक्षा की आड़ में आम आदमी से दूर हो जाना चाहते हैं। पर समय कितना बलवान है? राहुल जब ग्रेटर नोएडा में हर आशंका को दरकिनार कर किसानों से रूबरू थे, तो उनके साथ खड़ी थीं रीता बहुगुणा जोशी। कहने की जरूरत नहीं। रीता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं।

संयोगों के इस भंवर से निकल कर यथार्थ पर आते हैं। जनता जनार्दन ने साबित कर दिया है कि अब वही चलेगा, जो काम करेगा। असम में गोगोई इसीलिए तीसरी बार सत्ता में लौटते हैं, क्योंकि कमांडो सुरक्षा में रहने के बावजूद उन्होंने आम आदमी से अपने को दूर नहीं किया। ममता बनर्जी सादगी के बल पर 34 साला हुकूमत को ढहा देती हैं और अच्युतानंदन हारकर भी जीत जाते हैं। इसके उलट धृतराष्ट्र हो चले द्रमुक सुप्रीमो को मतदाता जिंदगी के आखिरी मुकाम पर सत्ता की चौहद्दियों से बाहर फेंक देते हैं। क्यों?

दरअसल, पिछले पांच साल में उत्तर से लेकर दक्षिण तक आम आदमी ने नेताओं को साफ संदेश दे दिया है कि हमें पार्टियों की शोशेबाजी नहीं, काम चाहिए। विचारधारा की लफ्फाजी नहीं, विकास चाहिए। हमारी राष्ट्रीय पार्टियों ने इसके बावजूद खुद को वंचना के दुर्गों में कैद कर रखा है। कभी इलाकाई ताकतें उनकी शक्ति का आधार होती थीं, पर पिछले 20 सालों में उन्हें जमींदोज करने की लहर-सी चल पड़ी है।

यही वजह है। अटल बिहारी वाजपेयी के परिदृश्य से हटते ही भाजपा लड़खड़ाने लगती है। उधर, कांग्रेस का सारा भार सोनिया और राहुल गांधी को उठाना पड़ता है। प्रकाश करात के फैसले केरल और पश्चिम बंगाल के लोगों को नहीं भाते और लाल दुर्ग ढह जाता है। वामपंथियों के बाद क्या अगली बारी अन्य राष्ट्रीय दलों की है? उन्हें संभलना होगा। काल की क्रूर नजर उन पर है।

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