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हम हर घर में थानेदार नहीं बिठा सकते

पांच राज्यों में सफलतापूर्वक हिंसा रहित चुनाव करवा चुके मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी के लिए अभी वक्त आराम का नहीं है। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में चुनाव हैं। आयोग उनकी तैयारी में व्यस्त है। मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना है कि टुकड़ों में होने वाले चुनावों में धन, समय और प्रशासनिक मशीनरी की काफी बर्बादी होती है, समय आ गया है कि संसद की तरह पूरे देश में विधानसभा चुनाव एक साथ करवाए जाएं। चुनाव के विभिन्न मुद्दों पर आयोग के मुखिया कुरैशी से रूबरू हुए हमारे विशेष संवाददाता श्याम सुमन :

आयोग के सामने धन-बल का इस्तेमाल रोकना हमेशा बड़ी चुनौती रहा है। इन चुनावों में इससे कैसे निपटा गया?
चुनावों में धन का इस्तेमाल रोकने के लिए हमने व्यापक प्रबंध किए थे। लेकिन उसके बाद भी असाधारण मात्र में धन जब्त हुआ। अकेले तमिलनाडु में 60 करोड़ रुपये जब्त हुए, यह एक रिकॉर्ड है। हालांकि इस जब्ती से यह नहीं कहा जा सकता कि धन का इस्तेमाल पूर्ण रूप से रोक लिया गया था। लेकिन इतना जरूर है इस जब्ती से 70 करोड़ रुपये और रुके होंगे, जो मतदाताओं को दिए जाने वाले थे। सवाल यह है कि हम हर घर में थानेदार नहीं बैठा सकते। इस पर रोकथाम पार्टियों के सहयोग से ही संभव है।

अपराधियों के चुनाव लड़ने के आप हमेशा विरोधी रहे हैं। चुनाव सुधारों में इस विषय पर बहस भी हो रही है। अब आगे क्या होगा?
देखिए, यह मामला पार्टियों में प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेता है। यदि किसी ने अपराधी खड़ा किया है, तो उसका मुकाबला करने के लिए विरोधी पार्टी अपराधी को ही खड़ा करती है। शरीफ आदमी उसका मुकाबला कर नहीं सकता। यह प्रतिस्पर्धा एक दुष्चक्र का रूप ले लेती है, जिसे तोड़ना आवश्यक है। यही हाल धन के मामले में है। गरीब उम्मीदवार कभी अमीर का मुकाबला नहीं कर सकता। मेरा मानना है कि हत्या, रेप, डकैती जैसे संगीन अपराधों में यदि कोर्ट आरोप तय कर देता है, तो ऐसे उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के अयोग्य कर देना चाहिए। आप कहते हैं कि आदमी तब तक निर्दोष है, जब तक आप उसे दोषी सिद्ध न कर दें। देश में चार लाख से ज्यादा लोग जेल में हैं। इनमें से दो लाख 68 हजार विचाराधीन कैदी हैं। ये कैदी वोट नहीं दे सकते, लेकिन चुनाव लड़ सकते हैं। आखिर चुनाव लड़ने में ऐसी क्या पवित्र बात है कि जो वोट नहीं दे सकता, वह चुनाव लड़ सकता है। लेकिन यही वे लोग हैं, जो कानून को बदलने नहीं देते, क्योंकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है।

तो आपका क्या सुझाव है?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुख्य सतर्कता आयुक्त थॉमस (सीवीसी) पर दिए गए फैसले को संसद जैसे संवैधानिक निकायों तक विस्तारित कर देना चाहिए। जिस तरह दागी व्यक्ति सीवीसी नहीं बन सकता, उसी प्रकार दागी को चुनाव लड़ने से भी रोकना चाहिए। संसद को ईमानदार संस्थान बनाना चाहिए, क्योंकि कानून बनाना ईमानदारी का कार्य है, जिसमें दागियों का कोई स्थान न हो। आप कहते हैं भ्रष्ट नेता लोकपाल (प्रस्तावित) के दायरे में आ जाएंगे और उन्हें सजा मिलेगी। हम कहते हैं कि यदि आप उसे शुरू में ही रोक दें, चुनाव ही न लड़ने दें, तो लोकपाल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन सरकार इसकी अनदेखी कर रही है, जिसकी कीमत उसे चुकानी पड़ेगी।

चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने की बात अक्सर की जाती है। यह सुझाव भी आया है कि सीमा समाप्त कर देनी चाहिए?
खर्च की सीमा बहुत जरूरी है। यदि यह नहीं रही, तो संसद और विधानसभाओं पर करोड़पतियों का कब्जा हो जाएगा। मौजूदा सीमा बिल्कुल ठीक है। यदि आप चुनाव में सीमा से ज्यादा खर्च करते हैं, तो आप कहीं न कहीं ईमानदारी से समझौता कर रहे हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि खर्च सीमा का पालन नैतिक ही नहीं, तार्किक भी है। खर्च की सीमा लांघना चुनाव कानून के अनुसार भ्रष्ट व्यवहार है, जिसके सिद्ध हो जाने पर जीते हुए उम्मीदवार का चुनाव रद्द हो सकता है। लेकिन समस्या खर्च सीमा को लागू करने की है। हालांकि हम सख्त योजनाएं बना रहे हैं और अभी से नेताओं को सचेत करना चाहते हैं कि वे खर्च सीमा न तोड़ें, क्योंकि इसके बहुत गंभीर परिणाम होने वाले हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि राजनैतिक दलों के फंड का हिसाब-किताब होना चाहिए?
आयोग कह चुका है कि पार्टियों का कोष पारदर्शी होना चाहिए। सभी लेन-देन चैक से हो और खातों का ऑडिट सीएजी के मान्यता प्राप्त सीए से होना चाहिए। पार्टियों को यह भी लिखा गया है कि वे अपने खातों को विवरण सार्वजनिक करें, जिससे उनकी पब्लिक स्क्रूटनी हो सके।

पेड न्यूज एक बड़ी समस्या है, लेकिन दक्षिण में राजनैतिक दलों के ही अपने टीवी चैनल हैं, ऐसे में पेड न्यूज को आप कैसे रोकेंगे?
हां, यह समस्या गंभीर है। लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि पांच राज्यों में हुए चुनाव में हमें पेड न्यूज की कुल 11 शिकायतें मिलीं, जिनमें से आठ पश्चिम बंगाल की थीं। लेकिन ऐसा नहीं है कि पेड न्यूज की घटना नहीं हुई। दरअसल सबने अपने-अपने चैनलों में प्रचार किया, इसलिए किसी ने शिकायत नहीं की। लेकिन हम इस प्रचार पर भी निगाह रख रहे हैं और अगले चुनावों में यदि ऐसा पाया गया, तो चैनल पर दिखाई गई खबर का समय मापा जाएगा और उसे चुनाव खर्च में जोड़ा जाएगा। इस संबंध में हम दिशा-निर्देश बना रहे हैं।

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