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पांच सूबों ने दिए पांच सबक

करीब एक महीना पहले जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हुई थी तो उत्तर भारत के उन लोगों की, जो इन चुनावों में वोटर नहीं थे, सबसे ज्यादा उत्सुकता इस सवाल को लेकर ही थी कि तमिलनाडु में डीएमके का क्या होगा? 

भ्रष्टाचार और परिवारवाद का इतनी बेशर्मी और उद्दंडता के साथ प्रदर्शन पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन आमतौर पर अपशकुनी समझे जाने वाले फ्राइडे द थर्टीन्थ (शुक्रवार, 13 तारीख) को जब डीएमके का सफाया होने की खबर आई तो तमिलनाडु के वोटर ने साबित किया कि वह भी उसी तरह सोच रहा था जैसे देश के दूसरे राज्यों में बाकी लोग।

केंद्र में यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के लिए यह नतीजे एक बड़ा सबक हैं। तमिलनाडु के वोटरों ने इस मिथ को ध्वस्त कर दिया है कि राज्य में कांग्रेस के बिना कोई गठबंधन सफल नहीं हो सकता। लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल का समय बाकी है। इतना समय यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम ही नहीं उठा रही, बल्कि उन पर अमल के लिए भी उतनी ही गंभीर है। 

तमिलनाडु के वोटरों ने काफी मुखरता से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस तर्क को खारिज कर दिया है कि गठबंधन सरकार की अपनी कुछ मजबूरियां होती हैं। इन नतीजों का एक और संदेश जो राष्ट्रीय दलों के लिए महत्वपूर्ण है वह यह कि बिना मजबूत व लोकप्रिय क्षेत्रीय नेताओं के वह ज्यादा समय राज्यों में नहीं टिक सकते।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में जयललिता, असम में तरुण गोगोई इसकी मिसाल हैं। केरल में वाम मोर्चा के नेता वी एस अच्युतानंदन के सामने कांग्रेस के नेता पूर्व मुख्यमंत्री ओमेन चांडी व प्रदेश अध्यक्ष रमेश चेन्निथला टिक नहीं पाए। कांग्रेस को अब यह भी अहसास हो रहा होगा कि पुद्दुचेरी में जनता के बीच लोकप्रिय एन रंगास्वामी को बाहर कर उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी।

आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद पूरे दक्षिण में कांग्रेस के पास एक भी कद्दावर क्षत्रप नहीं बचा है। भाजपा ने इस ओर ध्यान दिया है। जिन राज्यों में उसका जनाधार है वहां उसके पास मजबूत क्षेत्रीय नेता हैं। चाहे वह गुजरात हो, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार या उत्तर प्रदेश। कांग्रेस लगातार इस पहलू की उपेक्षा करती रही है।

राष्ट्रीय राजनीति में यह चुनाव परिणाम कोई उलट-फेर नहीं करने वाले। असम के परिणाम को छोड़ दें तो कांग्रेस को इन चुनावों ने इतराने लायक कुछ नहीं दिया है। यूपीए के सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता उतनी ही है जितनी गुरुवार तक थी। इस समय ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि अपने दम पर सरकार बना रहीं ममता बनर्जी केंद्र की सरकार के लिए किसी तरह का संकट पैदा करना चाहेंगी। केंद्र पर डीएमके की निर्भरता तो और भी बढ़ गई है।

कांग्रेस भी इस व्यवस्था में बदलाव के लिए फिलहाल शायद ही जल्दबाजी दिखाये। कम से कम लोकसभा चुनाव से पहले ऐसी संभावना नहीं लगती। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रशंसक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने पूर्ववर्ती से कुछ सीख की जरूरत जरूर पड़ सकती है। वाजपेयी ने यह कभी नहीं छुपाया कि तीन देवियों जयललिता, ममता व मायावती से डील करने में उन्हें पसीने आ जाते थे। मनमोहन सिंह को भी उन हालात के लिए खुद को तैयार करना होगा।

भाजपा का इन चुनावों में दांव पर ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन तमाम दावों के विपरीत असम के मतदाताओं ने उसे तगड़ा झटका दिया है। इन परिणामों से सबसे ज्यादा चिंतित होने की जरूरत वाम मोर्चा की अग्रणी पार्टी माकपा को है। अपने दो बड़े गढ़ खोने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका कम से कमतर होने की आशंका प्रकाश करात को अभी लंबे समय तक सतायेगी। राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए उनके पास अब एक ही विकल्प बचा है और वह यह कि जैसे भी हो नवीन पटनायक, नीतिश कुमार जैसे क्षत्रपों को साथ ले। जयललिता व मायावती जैसे क्षत्रपों को साथ लेकर एक गैर-कांग्रेस गैर भाजपा मोर्चे के गठन की कोशिश करें।

ढहा दिया ‘लाल’ किला
ममता बनर्जी : 5 जनवरी 1955 को कोलकाता में जन्मी ममता बनर्जी समर्थकों में दीदी के नाम से लोकप्रिय। सूती साड़ी, हवाई चप्पल, कंधे पर कपड़े का थैला और चेहरे पर हमेशा संघर्ष के भाव।  तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपनी सादगी और संघर्ष की बुनियाद पर पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के 34 साल पुराने किले को ढहाने में सफल रही हैं। उनकी पहचान एक जमीनी, संघर्षशील, तेज तर्रार और मुखर नेता की है। वह छोटे फायदे के लिए कभी अपने लक्ष्य से नहीं भटकी।

परिवार: अविवाहित

राजनीति : पश्चिम बंगाल में यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष के तौर राजनीति की शुरूआत की। पहली बार 1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर जादवपुर सीट से लोकसभा में पहुंची। कांग्रेस से अलग होने के बाद 1997 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना। दक्षिण कोलकाता सीट से 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में लोकसभा के लिए चुनी गईं। दो बार रेल मंत्री बनीं, पहले राजग के साथ गठबंधन में और फिर संप्रग सरकार-दो में यह जिम्मेदारी संभाली। करीब 13 साल के संघर्ष के बाद आखिरकार पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को हराकर  इतिहास रचने में सफल रही।

पांच चुनौतियां
’ खुद को बेहतर प्रशासक साबित करना
’ लोगों से किए वादों को हकीकत में बदलना
’ विकास खासकर औद्योगिक विकास के साथ तालमेल बैठाना
’ नक्सलवाद पर काबू पाना
’ किसान और उद्योगपतियों को एक साथ खुश करना

चुनाव हारे पर दिल जीता
वी.एस.अच्युतानंदन : 20 अक्टूबर 1923 को जन्में वीएस अच्युतानंदन अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि भले ही चुनाव में वाम मोर्चा फिर सत्ता पर काबिज नहीं हो सका लेकिन कांग्रेस नीत संयुक्त मोर्चे की जीत भी बांछें खिलाने वाली नहीं रही।

राजनीति: वी.एस.1940 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने । 1967, 1970,1991, 2001, 2006 में केरल विधानसभा सदस्य चुने गए।

संपत्ति: देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री। संपत्ति का मूल्य 80 हजार 295 रुपये। तीन हजार नकद

पांच चुनौतियां
’ काडर को फिर मजबूत करना
’ युवा उत्तराधिकारी की तलाश
’ केन्द्रीय नेतृत्व से तालमेल बैठाना
’ विपक्ष के नाते जनोपयोगी कार्य के लिए नई सरकार पर दबाव बनाना
’ सांप्रदायिक ताकतों से लड़ाई 

आयरन लेडी ने मनवाया लोहा
जे. जयललिता : 63 वर्षीय जयललिता राज्य में अम्मा, आयरनलेडी के नाम से प्रसिद्ध हैं। अम्मा को अन्नाद्रमुक पार्टी के संस्थापक और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एम.जी. रामचंद्रन राजनीति में लाए। मुख्यमंत्री रहते हुए उनके नाम कई उपलब्धियां हैं। उन्होंने राज्य में लाटरी बंद करवाई, किसानों को मुफ्त बिजली देने पर रोक लगाई, सस्ते चावलों के दाम बढ़ाए। इतना ही नहीं चंदन की लकड़ी के कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के खात्मे का श्रेय भी उन्हें ही जाता है।

राजनीति : जयललिता पहली बार 1982 में एआईडीएमके की ओर से राज्यसभा में पहुंची। 1991 और 2001 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी।  2004 के लोकसभा और 2006 के विधानसभा चुनावों में पार्टी हारी

परिवार: जया अविवाहित हैं लेकिन उन्होंने अपनी सहेली के पुत्र वी.एन. सुधाकरन को गोद ले रखा है। सुधाकरन की शादी धूमधाम से की थी।

संपत्ति : विधानसभा चुनाव से पहले जया ने जया ने अपनी 51 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति की घोषणा की थी।

पांच चुनौतियां
’ पिछले कार्यकाल के फैसलों के कारण बनी किसान, गरीब विरोध छवि से मुक्ति
’ जनता से संवाद कायम रखते हुए चुनाव पूर्व वादे पूरा करना।
’ बिगड़ी कानून एवं व्यवस्था की स्थिति में सुधार लाना
’ डीएमके सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच
’ राज्य में एक प्रभावी और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देना

गोगोई की हैट्रिक
तरुण गोगोई : असम के जोरहाट जिले में रंगाजन टी एस्टेट के डाक्टर कमलेश्वर गोगोई के यहां एक अप्रैल 1936 को जन्म। गुवाहाटी विश्वविद्यालय से लॉ में डिग्री हासिल की।

राजनीति: 1963 में कांग्रेस में शामिल हुए गोगोई गांधी परिवार के विश्वासपात्र रहे हैं। 17 मई 2001 में पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने। 2006 में दोबारा मुख्यमंत्री बने। 75 वर्षीय गोगोई केंद्र सरकार में मंत्री के अलावा छह बार लोकसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।  गोगोई 17 मई 2001 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उग्रवादी हिंसा को नीचे लाना और कर्ज के बोझ में दबे असम की वित्तीय अस्थिरिता का सुधारना उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन गोगोई ने स्थिति को सुधारा। इसी मेहनत का परिणाम था कि 2006 में वह अपने गठबंधन सहयोगी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ चुनाव लड़कर दुबारा सत्ता में लौटे।

परिवार : 1972 में डॉली और तरुण गोगोई की शादी हुई। उनकी एक बेटी और एक बेटा है। बेटी एमबीए है जबकि बेटे ने न्यूयार्क से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री हासिल की है।

संपत्ति:  चुनाव आयोग के पास दाखिल हलफनामा के मुताबिक चार करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति है।

पांच चुनौतियां
’ शांति प्रक्रिया को जारी रखना
’ उग्रवादी समूहों को वार्ता प्रक्रिया के जरिये समाज की मुख्यधारा से जोड़ना
’ हर साल आने वाली बाढ़ से निपटना
’ निवेश आकर्षित करना
’ राज्य में विकास की रफ्तार तेज करना

सादगी पंसद नेता को सौंपी सत्ता
एन रंगास्वामी : 4 अगस्त 1950 को पुद्दुचेरी में जन्मे रंगास्वामी सादगी के लिए समर्थकों में बेहद लोकप्रिय। मोटर साइकिल पर घूमना और चाय की दुकान पर बैठकर लोगों के साथ चाय पीने पर कोई ऐतराज नहीं है।  लोग उनकी इस सादगी को पसंद करते हैं और इसलिए उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपने के लिए जनादेश  दिया है।

राजनीति: रंगास्वामी 1991 में  पहली बार प्रदेश सरकार में कृषि मंत्री बने थे। 1996 में लोक निर्माण और सन 2000 में शिक्षा मंत्री का पद संभाला। 2006 में मुख्यमंत्री बने। 2008 में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायणसामी से रार के बाद  मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे  ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस का गठन किया। माना जा रहा है कि एन रंगास्वामी पुडुचेरी में एआईडीएमके के साथ मिलकर नई सरकार का गठन  करेंगे।

परिवार: अविवाहित

संपत्ति: सादगी पसंद रंगास्वामी के पास बेहद कम संपत्ति मानी गई है।

पांच चुनौतियां
’ स्थिर सरकार देना
’ विधानसभा चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादों को पूरा करना
’ सरकार में शामिल होने वाले सहयोगी दलों के साथ तालमेल बनाना
’ राज्य के आर्थिक विकास में तेजी लाना
’ सादगी पसंद और जनता के बीच रहने वाले नेता की छवि को बरकरार रखना

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