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भ्रष्टाचार के कलंक ने छीन ली नेताओं की कुर्सी

सत्ता की कुर्सी अब भ्रष्टाचार के कलंक से दूर भाग रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने उन्हीं दलों के उम्मीदवारों को वोट दिया जिनके दामन पर उन्हें भ्रष्टाचार के दाग कम नजर आये। घोटालों की जांच और दोषियों को सजा भले ही देर से मिले लेकिन मतदाताओं ने भ्रष्टाचारियों को सबक सिखा दिया है।

तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रमुक को टूजी स्पैक्ट्रम घोटाले की कीमत सत्ता गवांकर चुकानी पड़ी। पूर्व दूर संचार मंत्री ए राजा की गिरफ्तारी तथा राज्यसभा सदस्य कणिमोझी के खिलाफ आरोपपत्र का पटाक्षेप मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की कुर्सी छिनने के रूप में हुआ। संप्रग के प्रति नाराजगी का नुकसान द्रमुक के साथ-साथ कांग्रेस को भी हुआ। मतदाताओं ने राज्य में बदलाव के लिए अन्नाद्रमुक की नेता जयललिता को भारी बहुमत से जिताया।

पश्चिम बंगाल में तीन दशक से सत्ता पर काबिज वामदलों का कैडर तो भ्रष्टाचार का जैसे पर्याय बन चुका था। वहां माकपा और भाकपा कैडर को राशनकार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए घूस खिलाने के कथित आरोप लगे हैं। वामदलों के कैडर ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दे रखा था। यही कारण है कि आम लोगों ने वामदलों के आतंक से तंग आकर जमीनी स्तर पर किसानों और गरीबों की लड़ाई लड़ने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को वोट दिया। असम में भी भ्रष्टाचार का मुद्दा हावी रहा।

भाजपा ने मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के खिलाफ प्रचार अभियान का बिगुल फूंकते हुए उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे। पार्टी ने कई घोटालों की बाकायदा एक चाजर्शीट बनाई थी लेकिन मतदाताओं ने विपक्षी खेमे में दागी उम्मीदवारों की बजाय गोगोई को ही एक और मौका देना उचित समझा। केरल में मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन की साफ सुथरी छवि की बदौलत वाम मोर्चा चुनावी मैदान में आखिरी क्षण तक डटा रहा और कांग्रेस हारने से बाल-बाल बची।

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