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यूपीए के हाथ रही यह बाजी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे कई तरह से महत्वपूर्ण हैं। सिर्फ उन राज्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए। अगर इन विधानसभा चुनावों को लोकसभा के समीकरण से देखें, तो जिन राज्यों में चुनाव हुए, वहां से लोकसभा के 116 सदस्य आते हैं, और इन नतीजों के हिसाब से 78 सीटों पर यूपीए का कब्जा हो गया है। यानी केंद्र सरकार के लिए यह एक अच्छी खबर है।

इन नतीजों में सबसे महत्वपूर्ण पश्चिम बंगाल के नतीजे रहे हैं। इनमें एक ऐसी पार्टी हारी है, जो पिछले 34 साल से लगातार सत्ता में है, बल्कि  दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में किसी कम्युनिस्ट पार्टी ने लगातार इतने साल तक सरकार नहीं चलाई। और यह ऐसी हार है कि इसके बाद भारत के वामपंथियों में भारी मंथन होगा।
इस चुनाव में ममता बनर्जी को जनता का वैसा ही समर्थन मिला है, जैसा कि 1977 में ज्योति बसु को मिला था। पिछले लोकसभा चुनाव को देखें, तो वहां ममता बनर्जी के मोर्चे और वामपंथियों के मत प्रतिशत में बस एक प्रतिशत का अंतर था। लेकिन इस बार यह अंतर काफी बढ़ गया है और इसी के साथ ममता बनर्जी की चुनौतियां भी।

अब हम ऐसा नहीं कह सकते कि ममता बनर्जी को किसी एक जगह से या एक तबके के वोट मिले हैं। उन्हें हर जगह से, हर वर्ग का समर्थन मिला है। ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बदले की भावना को काबू में रखने की होगी, क्योंकि वामपंथियों को सबक सिखाया जाए, ऐसे दबाव उन पर काफी होंगे। ममता बनर्जी ने जीत के बाद कहा है कि वह उद्योग और कृषि को साथ लेकर चलेंगी। इसमें दो बातें हैं, एक तो वह अपनी उद्योग विरोधी छवि को तोड़ना चाहती हैं और दूसरी बात यह कि वह समन्वय की नीति पर ही आगे चलेंगी।

सबसे ज्यादा हैरत में डालने वाले नतीजे तो असम के हैं। इस राज्य में कांग्रेस का लगतार तीसरी बार जीतना यह बताता है कि राज्य में जनता के पास और कोई भरोसेमंद विकल्प नहीं है। असम गण परिषद बुरी तरह पिट चुकी है। अल्पसंख्यक मतदाता उससे दूर हो चुके हैं। राज्य का तकरीबन आधा हिस्सा स्वायत्त क्षेत्रों में जा चुका है, इन क्षेत्रों में हो रहे काम का फायदा कांग्रेस को मिल रहा है।

उल्फा की हिंसक राजनीति से लोगों में काफी नाराजगी है, लेकिन गोगोई सरकार ने इस हिंसा पर काबू पाने और उल्फा के बागी नेताओं से वार्ता करने का जो तरीका अपनाया है, उसे राज्य में पसंद किया जा रहा है। इस संगठन के कई बड़े नेता आत्मसमर्पण कर चुके हैं। उनमें अरविंद राजखोवा भी हैं, जो संगठन के संस्थापकों में से एक हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बातचीत काफी सलीके से चल रही है। देश के किसी भी हिस्से में बागियों से इतनी गंभीरता से बातचीत शायद कहीं और नहीं हो रही। इसके अलावा बांग्लादेश की तरफ से भी उल्फा पर काफी दबाव है।

इन्हीं सब चीजों के चलते तरुण गोगोई की सरकार को पहले से कहीं ज्यादा समर्थन मिला है। इसके पहले असम में सिर्फ बिष्णु राम मेहदी ही ऐसे नेता थे, जो लगातार 13 साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे। अब लगता है कि अगर तरुण गोगोई को मौका मिला, तो वह उस रिकॉर्ड को भी तोड़ सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में भले ही वाम मोर्चे को बड़ी हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन केरल में मोर्चे ने खुद को बुरी स्थिति से बचा लिया है। पिछले लोकसभा चुनावों के नतीजों को देखें, तो वाम मोर्चा सिर्फ 40 सीटों पर आगे था। वाम मोर्चे ने अगर खुद को इन हालात से बचा लिया, तो उसके दो कारण थे। एक तो इस बीच उसकी सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर काफी मेहनत की। लोगों को दो रुपये किलो चावल देने से लेकर महिलाओं को अवसर देने तक के कई काम उसने किए।

दूसरी वजह थी कि इस चुनाव में मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ही मुद्दा बन गए थे। वह केरल के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं, इसलिए स्वाभाविक ही उनके मुद्दा बन जाने का फायदा उनकी पार्टी को मिला। लेकिन मामूली ही सही बहुमत लोकतांत्रिक मोर्चे के साथ है, इसलिए उसकी सरकार अगले पांच साल तक चलती रहेगी। केरल उन राज्यों में नहीं है, जहां सरकारें बीच में ही जोड़तोड़ से बनती-गिरती रही हों।

तमिलनाडु में करुणानिधि की पार्टी द्रमुक हार सकती है, यह तो काफी पहले से लगने लगा था, लेकिन यह हार इतनी करारी होगी, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। चुनाव प्रचार के समय द्रमुक के पास अपनी विकास योजनाएं ही सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर थीं। राज्य सरकार ने विकास और कल्याण के मोर्चे पर वाकई काफी काम किया है। लेकिन उसके मुकाबले जयललिता के दो नारे थे। एक तो लोकतंत्र बचाओ- परिवारवाद हटाओ, और दूसरा लोकतंत्र बचाओ- भ्रष्टाचारियों को हटाओ।

जनता ने विकास योजनाओं के तर्क को नकारकर जयललिता के नारों को ही स्वीकार किया। और इस हद तक स्वीकार किया कि अब द्रमुक एक छोटी पार्टी भर रह गई है। इसके अलावा तमिलनाडु में कांग्रेस समेत उसके सहयोगी दलों की स्थिति तो और भी खराब हो चुकी है। कभी इस राज्य में कांग्रेस अपने बल पर चुनाव लड़ने की बात सोचने लगी थी और अब वह हाशिये की पार्टी बन गई है। कांग्रेस को इस पर सोचना चाहिए।

कांग्रेस के लिए सोचने वाली कई और बातें हैं। यूपीए के लिए ये चुनाव नतीजे भले ही बहुत अच्छे रहे हों, लेकिन कांग्रेस के लिए असम को छोड़कर और कहीं भी उतने अच्छे नहीं रहे। केरल में उसका मोर्चा सरकार बनाने की स्थिति में जरूर आ गया है, लेकिन वह लोकसभा चुनाव के अपने प्रदर्शन को कायम नहीं रख सका है। इन राज्यों में अगर हम असम और केरल को छोड़ दें, तो पार्टी के पास कहीं भी कोई बहुत बड़ा स्थानीय नेता नहीं है। पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर राय के बाद ममता बनर्जी ही बड़ी नेता थीं, लेकिन उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। ये नतीजे इतना तो बताते ही हैं कि कांग्रेस को राज्यों में स्थानीय नेतृत्व विकसित करना होगा।

केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के लिए ये नतीजे एक अच्छी खबर जरूर हो सकते हैं। गठबंधन का सबसे ज्यादा दबाव उन्हें द्रमुक की ओर से ही ङोलना पड़ता था, ये दबाव अब कुछ कम हो जाएंगे। तमिलनाडु का पिछला इतिहास बताता है कि अब द्रमुक को अन्नाद्रमुक की बदले की कार्रवाइयों को ङोलना पड़ेगा। ऐसे में उसे केंद्र सरकार के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। वह अब पहले की तरह केंद्र सरकार को ब्लैक मेल करने की स्थिति में नहीं होगी।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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