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शिखर पर पहुंचती महिलाओं का असर

एक तरफ हवाई चप्पल और सूती साड़ी पहने ममता बनर्जी, दूसरी तरफ सजी-संवरी जयललिता, इतनी एक्सक्लूसिव कि उनकी साड़ी की डिजाइन की दूसरी साड़ी नहीं बनाई जा सकती। सबसे बड़े गठबंधन की अध्यक्षा सोनिया गांधी, विरोधी दल की नेता सुषमा स्वराज, उत्तर प्रदेश की कमान संभालती तेजतर्रार मायावती, तो दिल्ली की सौम्य मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। ये वे महिलाएं हैं, जो पुरुषों की दुनिया की राजनीति को बखूबी  संभाल रही हैं।

ममता ने जहां वामपंथियों के लालगढ़ को उखाड़ फेंका है, वहीं जयललिता ने करुणानिधि के वंशवाद को चुनौती देते हुए विजय हासिल की है। शीला दीक्षित तो पहले ही हैट्रिक बना चुकी हैं। दलित हितों की प्रवक्ता के रूप में मायावती की पहचान को आज तक कोई चुनौती नहीं दे सका।

हाल ही की जनगणना ने लड़कियों की स्थिति में सुधार की बात कही थी। ममता हों या जयललिता, उनकी जीत भी इसी ओर इशारा कर रही है। मतदान के दौरान जो चित्र दिखे थे, उनमें बड़ी संख्या में घूंघट काढ़े बच्चों को गोद में उठाए औरतें नजर आती थीं। निम्न और मध्य वर्ग की ये ही औरतें हैं, जो किसी औरत को सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा देख अपनी ही जीत समझती हैं।

बहुत पहले मां या दादी अक्सर आर्शीवाद देती हुई कहती थीं, जा राजरानी बन। उन्हीं दादी-नानी के वचनों को आज की औरतों ने पूरा कर दिखाया है। वे सत्ता के शिखरों पर पहुंच रही हैं। अभी जब आईएएस के रिजल्ट आए, तो टॉप 20 में पांच महिलाएं थीं। वे बिना किसी कोटे के अपनी जगह बना रही हैं।

चाहे पेप्सीको की इंदिरा नूई हों, आईसीआईसीआई की चंदा कोचर, एक्सिस बैंक की शिखा शर्मा, नालंदा यूनिवर्सिटी की गोपा सब्बरवाल या बायकॉन की किरण शॉ मजूमदार। हाल ही में कश्मीर में एक मुसलिम बहुल इलाके में आशा भट्ट ने चुनाव जीता। राजस्थान के गांव सोडा की सरपंच छवि राजावत ने उच्च शिक्षा के बाद अपने गांव में रहकर काम करना पसंद किया। सेना में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है।

इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री बनी थीं, तो उस समय भी महिलाएं उन्हें अपने आदर्श की तरह देखती थीं। सफल महिलाएं प्रेरणा देती हैं। वे रोल मॉडल बनती हैं। कभी मायावती अपने बालों में रबरबैंड लगाती थीं। तब मुंबई में दलित स्त्रियों के बीच वैसा रबरबैंड बहुत लोकप्रिय हो गया था। यह फैशन का नहीं, अनुसरण का मामला है, जो बताता है कि उनकी आंखों में भी कहीं मायावती बनने का सपना होगा। वे उस मुकाम तक पहुंच भी सकती हैं, क्योंकि यह भारत की स्त्रियों के अभ्युदय और उत्कर्ष का समय है।

आज जिन चार राज्यों को महिलाएं संभाल रही हैं या संभालेंगीं, उनकी आबादी 48 करोड़ के आसपास है। जबकि अमेरिका की कुल आबादी 31 करोड़ से कुछ कम ही है। इसके बावजूद आजतक अमेरिका में कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी है।

(ये लेखिका के निजी विचार हैं)

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