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दफ्तर में फाइल के सरकने का गतिशास्त्र

मैं बारहवीं बार उनसे मिल रहा था। उम्मीद थी, तेरहवीं में वह मेरा काम जरूर निपटाएंगे। वह एक सरकारी ऑफिस में मुलाजिम थे। वहां पर सारे काम सरक-सरककर होते थे। आशा थी, मेरी भी अटकी हुई फाइल एक रोज जरूर उनकी मेज से सरकेगी। मुझे देखकर वह खीसें निपोरते हुए बोले, क्या बताऊं, आपके हटते ही बात दिमाग से निकल जाती है। काम ही काम है। इतना लोड है कि ब्रेन का ट्रांसफॉरमर दगा रहता है। चार सीटों का जिम्मा अकेला झेल रहा हूं।
 
तत्पश्चात सार्वजनिक क्षेत्र की रोजगार नीति पर अपना रेड पेपर जारी करते हुए उन्होंने पान की पीक से बगल में पड़ी हुई पिछली सदी से यथास्थान स्थापित वेस्ट पेपर बास्केट का मुंह लाल किया और फिर मेरी तरफ मुखातिब हुए, अगले वीक एक दफा और कष्ट कीजिए। इतना कहकर वह एक पत्रवली पर रिमाइंडर टांकने लगे। 

सहसा सिर उठाया। अपने लाल दांतों को निपोरते हुए बोले, भाई साहब, आजकल पर्सनल लाइजनिंग का जमाना है। जो सामने पड़ता है, उसका काम पहले होता है। मैं आपकी फाइल निकालकर ऊपर ही रख छोडूंगा। आपके सामने ही लिखा-पढ़ी कर दूंगा। आगे ऊपर वालों की मरजी। ऊपर वालों की या ऊपर वाले की? मैंने एकतरफा आत्मीयता जताने का फालतू प्रयास किया। वह हा-हा कर हंसने लग गए।

पर ये सारी आत्मीयता निर्थक हो गई। अगली मुलाकात में वह सब कुछ भूल चुके थे। कहने लगे, क्या काम है? मुझे नए सिरे से याद दिलाना पड़ा। मैं फट पड़ा, आप जैसा घाघ मैंने आज तक नहीं देखा। काम नहीं करना, तो साफ मना कर दीजिए। फिर मैं कोई दूसरा रास्ता देखूं।

उन पर असर नाम का कोई कीड़ा रेंगा। बोले, दूसरा रास्ता देखूं का क्या मतलब? काम तो मुझे ही करना है। आप जैसों के साथ यही तो दिक्कत है। हथेली पर सरसों उगाना चाहते हैं और मुट्ठी ठंडी रखते हैं। 

उन्होंने सामने रैक की तरफ इशारा करते हुए कहा, वे जो सालों से रखी हुई फाइलें हैं, उनसे क्या मेरी पर्सनल एनिमिटी है। आप जैसे लोग समझते हैं, सरकारी लोग कुछ करते-धरते नहीं। अजी, आप हाथ पर कुछ धरें, तो हम भी कुछ करें। मुझे करने-धरने की सच्ची मीनिंग समझ में आ गई थी। चौदहवीं बार की नौबत नहीं आई।        

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  • Web Title:दफ्तर में फाइल के सरकने का गतिशास्त्र