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दोहरी शख्सीयत

अपनी टीम को जोरदार भाषण पिला आए थे। अपने कमरे में लौटे, तो मन ही मन हंसने लगे। अरे, ये क्या कह दिया मैंने? मैं वो सब कह रहा था, जिसे मैंने ही नहीं किया।
 
हम जो कहते हैं, अक्सर करते नहीं हैं। शायद इसीलिए प्रोफेसर डगलस टी. केनरिक मानते हैं कि हम सब दोहरी शख्सीयत होते हैं। हम एक तरफ माफ करने और भूल जाने का पाठ पढ़ाते हैं। दूसरी ओर किसी को न माफ करते हैं और न कुछ भूलते ही हैं। वह एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए हैं। हाल ही में उनकी किताब आई है, ‘सेक्स, मर्डर ऐंड द मीनिंग ऑफ लाइफ।’ ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद उन्होंने दोहरी शख्सीयत की बात उठाई है।
 
हम सब दोहरी शख्सीयत के मालिक हैं। दोहरी नागरिकता की तरह हमारी शख्सीयत भी दोहरी होती है। हम एक जगह कुछ होते हैं और दूसरे में निहायत अलग। हम बाहर से कुछ होते हैं, भीतर से कुछ और। हमारे बाहर कहने वाला कुछ होता है, भीतर का काम करने वाला कुछ और। दरअसल, हमारे बाहर और भीतर में इतना फर्क होता है कि हमें दो अलग शख्सीयतों का एहसास होता है।
 
बाहर और भीतर को लेकर एक संघर्ष चलता रहता है। उससे निबटने के लिए हमें खासी मशक्कत करनी पड़ती है। जाहिर है, यह आसान काम नहीं है। इसमें हमें अपने से ही लड़ना पड़ता है। और हम लड़ना नहीं चाहते। कम से कम अपने से लड़ना हमें अच्छा नहीं लगता। और उस अपने से लड़े बिना हम बाहर-भीतर को एक नहीं कर सकते। इसीलिए हम आराम से बाहर और भीतर अलग-अलग बने रहते हैं। हमारा भीतर इसे बहुत जल्द मान जाता है। लेकिन बाहर से हम मानने को तैयार नहीं होते। बाहर से जैसे ही चोट होती है, तो हम मोर्चा खोल देते हैं। तय कर लेते हैं कि अपने बाहर और भीतर को मिलने ही नहीं देना है।                     

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  • Web Title:दोहरी शख्सीयत