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नतीजों का संदेश

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का भारतीय राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा, खासकर पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की करारी हार का। इस हार से लोकतांत्रिक चुनावों के जरिये 34 वर्ष लगातार सत्ता में रही दुनिया की एकमात्र कम्युनिस्ट सरकार का पतन तो हुआ ही है, इससे भारतीय राजनीति में वामपंथ की भूमिका भी सिमट जाएगी। बाकी चुनावों में स्थानीय कारक भी महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन ये भारतीय राजनीति के एक स्पष्ट रुझान को दिखाते हैं, जो पिछले लोकसभा चुनावों में और कुछ विधानसभा चुनावों में भी दिखाई दिया।

अब भारतीय मतदाता न किसी भावनात्मक अपील की परवाह करते हैं, न जाति, धर्म वगैरा ही उनके लिए इतना महत्वपूर्ण है। विचारधारा की जगह भी अब सिमट गई है। मतदाता अब आमतौर पर उम्मीदवार की योग्यता और सरकार के कामकाज के आधार पर फैसला करते हैं। जहां उन्होंने पश्चिम बंगाल में विचारधारा की तानाशाही को बुरी तरह परास्त किया है, वहीं तमिलनाडु में भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ इतना प्रभावशाली फैसला सुनाया है कि करुणानिधि परिवार को इस झटके से उबरने में काफी वक्त लगेगा।

केरल में वामपंथी मोर्चे ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे को जोरदार टक्कर दी है, तो इसकी वजह सिर्फ बुजुर्ग नेता वीएस अच्युतानंदन हैं। अगर माकपा अच्युतानंदन को टिकट न देने की जिद पर अड़ी रहती, तो वाम मोर्चे की वैसी ही सफाई हो जाती, जैसी पश्चिम बंगाल में हुई।

अच्युतानंदन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के कतई प्रिय नहीं हैं, लेकिन ईमानदारी, सादगी और अच्छे प्रशासन की वजह से वह मतदाताओं में लोकप्रिय हैं। माकपा को पश्चिम बंगाल और केरल के नतीजों पर काफी विचारमंथन और आत्मालोचना की जरूरत है। इन चुनावों ने राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ का महत्व बेहद कम कर दिया है। 

वामपंथी धड़ा प्रभावशाली इसलिए बना रहा, क्योंकि अस्थिर राजनीति के दौर में उनकी संगठित ताकत अक्सर निर्णायक होती थी। उनके अधिकतर नेता व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार, पढ़े-लिखे और अनुशासित थे। 

लेकिन वामपंथियों ने बदलते भारत की नब्ज पहचानने और अपने आप को बदलने की कोशिश नहीं की और वे पुराने नारों और सुझावों के सहारे राजनीति करते रहे। वे उन युवा मतदाताओं की उम्मीदों को नहीं समझ पाए, जिन्हें भूमंडलीकरण का या अमेरिकी साम्राज्यवाद का डर नहीं सताता। उन मतदाताओं की ममता बनर्जी की जीत में बहुत बड़ी भूमिका है, जो तब पैदा भी नहीं हुए थे, जब ज्योति बसु ने पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला था।

इसी तरह तमिलनाडु में भी नए मतदाताओं को न करुणानिधि परिवार के पारिवारिक नाटकों में दिलचस्पी है, न वे भ्रष्टाचार को इसलिए माफ कर सकते हैं कि उनके पीछे अमुक परिवार या जाति का व्यक्ति है। वे साफ-सुथरा प्रशासन और विकास चाहते हैं। 

शायद जयललिता ने भी यह महसूस किया होगा कि अब तमिलनाडु का मतदाता उनके पुराने समय के तौर-तरीके बर्दाश्त नहीं करेगा। वह अपने पुराने सामंती संस्कार छोड़ चुका है और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक है। ममता बनर्जी को भी यह साबित करना होगा कि वह एक योग्य और मेहनती प्रशासक हैं।

असम में लगातार तीसरी बार कांग्रेस को भारी बहुमत से जिताकर असम के मतदाताओं ने भी यह संदेश दिया है कि वे शांति के माहौल में विकास चाहते हैं। यह चुनाव परिणाम असम ही नहीं, सारे पूर्वोत्तर में बदलते माहौल का सूचक है। भारतीय मतदाताओं ने अपने पुराने तौर-तरीके बदल दिए हैं, वे अब योग्यता की कठोर कसौटी पर नेता को कसते हैं। जो राजनेता यह भांप लेंगे, वे ही अब सफल होंगे।

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