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नए चोले में पूर्व नरेश

बुधवार को ज्ञानेंद्र शाह पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में कालीदास बाबा द्वारा आयोजित यज्ञ में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। एक हिंदू राष्ट्र के रूप में नेपाल की पुनर्स्थापना की कामना के साथ बाबा ने इस यज्ञ का आयोजन किया था। लेकिन महायज्ञ में पूर्व नरेश की मौजूदगी का जो भी प्रतीकात्मक महत्व रहा हो, उसे भी उन्होंने गंवा दिया।

जैसे कि ब्योरे हैं, पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र ने वहां पर कहा, ‘जिस व्यक्ति ने कभी देश की जिम्मेदारी संभाली हो, वह मौजूदा हालात में खुद को अलग-थलग नहीं रख सकता।’ ऐसा लगता है कि उन्होंने अब तक कुछ भी नहीं सीखा : यह उनकी राजनीतिक लिप्सा ही थी, जिसने उन्हें अत्यंत अलोकप्रिय शासक बनाया था, कहा तो यह भी जाता है कि यदि राजा बीरेंद्र रहे होते, तो राजशाही यों नहीं खत्म होती, बल्कि उसका वजूद बना रहता। 

अपने छोटे भाई के विपरीत राजा बीरेंद्र काफी समझदार थे और वर्ष 1990 में लोकतंत्र की स्थापना की जन-आकांक्षा को समझते हुए ही उन्होंने खुद को पीछे कर लिया था। दूसरी तरफ, ज्ञानेंद्र ने जनता की आकांक्षाओं को संगीन तले रौंदने का काम किया।

बहरहाल, हमारा यह कतई आशय नहीं है कि ज्ञानेंद्र को राजनीति करने का कोई अधिकार नहीं है। एक नेपाली नागरिक के रूप में उन्हें वे तमाम अधिकार और सुविधाएं हासिल हैं, जो दूसरे नेपालियों को प्राप्त हैं। लेकिन वह पूर्व नरेश की दोहरी भूमिका नहीं निभा सकते, जो आज भी देश द्वारा दिए गए महल में रहते हैं, और करदाताओं के धन के सहारे राजनीति भी कर रहे हैं।

हालांकि पूर्व में कई बार उन्होंने अपनी बुद्धिमता का भी परिचय दिया है। उन्हीं में से एक थी 2005 की उनकी वह स्वीकारोक्ति, जो राजशाही के अधिग्रहण के तत्काल बाद उन्होंने मानी थी, ‘जो लोग अयोग्य हैं, वे मेरे साथ हैं और सक्षम लोग मेरे साथ नहीं हैं।’ तो उनके ही शब्दों को उधार लेते हुए कहना पड़ेगा कि वैसे ही कुछ अक्षम लोगों के उकसाने पर उन्होंने बुधवार को वह बात कही। उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2008 में ही लोगों ने राजशाही के अंत के पक्ष में जबर्दस्त जनादेश दे दिया था और अब तो नेपाल काफी आगे निकल आया है।                              

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