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भूमि अधिग्रहण कानून बदलना होगा

ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल गांव में जो दुखद घटनाक्रम हुआ, वह कोई नई बात नहीं है। उत्तर प्रदेश में पिछले पांच साल में ऐसी कई घटनाएं घट चुकी हैं, बल्कि इसी इलाके में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। आगरा में भी हो चुकी हैं, मथुरा में भी हो चुकी हैं और हर जगह के किसानों का दर्द एक ही है। उनसे सस्ते भाव पर जमीन ली गई और फिर उसे बिल्डरों-उद्योगपतियों को बहुत महंगे दामों पर बेच दिया गया।

अब ग्रेटर नोएडा में किसानों से जो जमीन 800 रुपये के भाव पर ली गई, उसका बाजार भाव 20 हजार रुपये से भी ऊपर है। जाहिर है, यह किसानों की पुश्तैनी जमीन है, यही उनकी रोजी-रोटी है। यह जमीन अगर इस तरह से जाएगी, तो उनमें गुस्सा आएगा ही। वे विरोध तो करेंगे ही।

अच्छा तो यह होता कि आंदोलन करने वाले किसानों से बात की जाती। और यह बात भी राजनैतिक स्तर पर होनी चाहिए थी। राज्य सरकार का कोई मंत्री आता, विधायक, सांसद आते। लेकिन इस आंदोलन से निपटने का काम अफसर तंत्र के हवाले कर दिया गया। यह सचमुच दुखद है कि इस दौरान जो हिंसा हुई, उसमें दो पुलिसवालों की जान गई, जिलाधिकारी को गोली लगी, लेकिन इसकी प्रतिक्रिया में अफसर तंत्र ने जो किया, वह और भी दुखद है।

इसका यह मतलब नहीं था कि जवाब में पुलिस हर जगह दहशत फैला दे। और अब जब राजनैतिक दलों के लोग वहां जा रहे हैं, तो इसका भी बुरा माना जा रहा है। उन्हें वहां जाने से रोका जा रहा है। इस दुख के समय राजनैतिक दल वहां नहीं जाएंगे, तो कब जाएंगे? अगर शुरू में ही बातचीत की गई होती, तो समस्या शायद इस हद तक पहुंचती भी नहीं। 

तात्कालिक हल के लिए बातचीत जरूरी है। लेकिन समस्या की असली जड़ 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून है। इसके तहत सरकार जब चाहे जो भी जमीन ले सकती है। जब तक यह कानून नहीं बदलता, चीजें नहीं बदलेंगी और देश भर की सरकारें प्रॉपर्टी डीलर की तरह काम करती रहेंगी। न जाने कब से इस कानून को बदलने की बात चल रही है, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

साल 2007 में इसका एक मसौदा बना था, जो अभी तक पेंडिंग है। दो दिन पहले मैं इस सिलसिले में प्रधानमंत्री से मिला था और उन्होंने आश्वासन दिया है कि संसद के अगले सत्र में यह बिल पेश कर दिया जाएगा। हमने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलास राव देशमुख से भी इस संदर्भ में मुलाकात की है, उनका भी कहना है कि इसे पेश करने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

इस समय हमारी सारी चिंता इस बात की है कि इस सरकारी बिल में बहुत-सी खामियां हैं। इसलिए हमने एक वैकल्पिक भूमि अधिग्रहण बिल तैयार किया है। मैं इसे अगले सत्र में प्राइवेट मेंबर बिल की तरह पेश करूंगा। सरकारी बिल में बहुत सारी ऐसी चीजें हैं, जो हमारी नजर में गलत हैं।

पहली दिक्कत तो इसमें दी गई परिभाषाओं को लेकर है। खासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र की परिभाषा का लेकर। आजकल निजी व सार्वजनिक क्षेत्र की साझेदारी की बात काफी हो रही है, जिसे पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) कहा जाता है। अब मान लीजिए सरकार किसी जमीन का अधिग्रहण करे, और फिर उसे पीपीपी के नाम पर निजी क्षेत्र को लीज पर दे दे। तो मामला फिर वहीं पर पहुंच जाएगा। इसलिए जरूरी है कि सार्वजनिक कामों के लिए ली गई जमीन का मामला शुरू से आखिर तक स्पष्ट हो।

हम बिल के इस प्रावधान का भी विरोध करते हैं कि राज्य सरकार किसी भी परियोजना के लिए 30 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। इसके पीछे सोच यह है कि निजी क्षेत्र की किसी परियोजना के लिए अगर कोई बाधा आती है, तो सरकार इस तरह से मदद कर सकती है। हमारा मानना है कि अगर इस अनुपात को 10 से 15 प्रतिशत कर दिया जाए, तो समस्या सुलझ सकती है।

फिर किस परियोजना के लिए यह जरूरी है, इसे तय करने का काम राज्य सरकार पर ही छोड़ दिया गया है। हमारा कहना यह है कि इसे राज्य सरकार पर न छोड़ा जाए। यह बिल में ही साफ कर दिया जाए कि किस स्थिति में राज्य सरकार यह काम कर सकती है। इसके अलावा जमीन का बाजार भाव किस तरह से तय होगा और अगर जमीन को लेकर कुछ विवाद पैदा होते हैं, तो उनका निस्तारण किस तरह से होगा, ये सारी बातें हैं, जिन पर हम सरकारी बिल से सहमत नहीं हैं और इन पर हमने अपने वैकल्पिक बिल में काफी जोर दिया है। 

एक मसला यह भी है कि जिस काम के लिए जमीन ली गई है, यदि वह काम अगले पांच साल तक होता ही नहीं, तो क्या किया जाए। हमारा कहना है कि इस सूरत में जमीन किसान को वापस कर दी जाए, क्योंकि कुछ भी हो जमीन पर पहला हक किसान का ही है।

बिल अगर पास होता है, तो एक समस्या इसे लागू करने को लेकर भी आएगी। इस नए बिल को जब अंतिम रूप दिया जा रहा होगा, तो कई राज्य सरकारें योजनाएं बनाकर बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी करेंगी और बाद में यह कहा जाएगा कि चूंकि अधिसूचना पहले ही जारी हो गई थी और बिल बाद में पास हुआ, इसलिए नया कानून पुराने नोटीफिकेशन पर लागू नहीं होगा।

आमतौर पर नोटीफिकेशन कई बरस पहले ही जारी कर दिए जाते हैं। मसलन यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए दो लाख हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना बहुत पहले ही जारी हो गई थी। हमारा कहना यह है कि सिर्फ नोटीफिकेशन को ही आधार नहीं माना जाना चाहिए। और जहां मामला किसी भी तरह से अदालती विवाद में हो, उस जमीन पर भी नया कानून ही लागू होना चाहिए।

मैंने ये सारी चिंताएं ग्रामीण विकास मंत्री को बता दी हैं। इसमें से ज्यादातर बातों से वह सहमत दिखाई दिए। हालांकि एक-दो चीजों पर हमारी असहमति थी। और इन्हीं असहमतियों के कारण ही हमने वैकल्पिक बिल पेश करने का फैसला किया है। 

(बातचीत पर आधारित)

यह लेखक के निजी विचार हैं

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