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किराये पर कुत्ते और रिश्तेदार

क्या मस्त खबर आई है कि जापान के बाद अब कोरिया में भी कुत्ते किराये पर मिलने लगे हैं। लोग अपने बच्चों का मन बहलाने के लिए भारी किराये पर इन कुत्तों को घर ले जाते हैं और बच्चे इनसे इतने हिल-मिल जाते हैं कि अक्सर तय समय से दो-चार दिन बाद ही कुत्ते वापस होते हैं और एक्स्ट्रा किराया देना पड़ता है। अब वो दिन दूर नहीं कि कुछ दिन बाद तमाम रिश्तेदार भी किराये पर मिला करेंगे।

वैसे भी आजकल एक बेटा-एक बेटी वाले कांसेप्ट की वजह से कुछ दिनों बाद चाचा और मौसी की प्रजाति विलुप्त होने ही वाली है, सो कंपनियां किराये पर चाचा-मौसी सप्लाई किया करेंगी। इसके अलावा, लोग इतने बिजी हो गए हैं कि उनके पास रिश्तेदारों की शादी, मुंडन आदि फंक्शनों में जाने का टाइम ही नहीं है, सो तमाम कंपनियां किराये पर फूफा-जीजा, मौसा-दादा आदि भी सप्लाई किया करेंगी। ऑर्डर कुछ यूं आएंगे- जी, एक बढ़िया-सा फूफा भेज दीजिए। जरा ठीक-ठाक भेजिएगा। पिछली बार आपने जिसको भेजा था, उस कमीने ने दूल्हे की भाभी को ही छेड़ दिया था।

हाई-फाई बंदे फोन करेंगे- जी, एक बेटा भेज दीजिए, एक्चुअली पिताजी का श्राद्ध करना है और मेरे पास इतना टाइम नहीं है कि सारे काम छोड़कर दस दिन घर बैठकर श्राद्ध करूं। ये कंपनियां हिट हो जाएंगी। खबर है कि भारत के एक उद्यमी ने किराये पर कुत्ते वाली खबर पढ़कर अपने यहां भी यह कंपनी खोलने की सोची। ऊंची सैलरी पर कुत्तों की भर्ती के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन दिए गए,पर इंटरव्यू के दिन वह ये देखकर दंग रह गए कि कुत्ते तो एक भी नहीं आए, पर बड़ी संख्या में हाथों में फाइल लिए पिचके गाल वाले युवक और बुजुर्ग आ खड़े हुए। 

लेकिन हम लोगों को तो कुत्ते चाहिए, मैनेजर बोला। सर, हम लोग भी कुत्ते ही हैं, बेरोजगारी ने हम लोगों की हालत कुत्ते जैसी ही कर दी है, यह कहते हुए पट्ठों ने मैनेजर को दौड़ा लिया। उधर किराये वाले कुत्तों ने बताया कि बार-बार घर बदलना ठीक नहीं लगता। आखिर हम कुत्ते हैं, कोई नेता नहीं कि आज यहां, कल वहां।

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