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भरोसे का फर्क है

ये क्या हो रहा है? अचानक उनकी नींद खुल गई। कल उन्हें अपने नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू करना है। लेकिन अपनी टीम पर भरोसा नहीं हो रहा। भरोसे के बिना हम जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकते। मशहूर पत्रकार और लेखक ऐरिक वीनर मानते हैं, ‘असल में जिंदगी वही जीते हैं, जो भरोसा करते हैं। वही देश सबसे ज्यादा खुश हैं, जहां लोगों को भरोसा है। सरकार में, सामाजिक संस्थाओं में, अपने पड़ोसियों में।’

ऐरिक ने बहुत दुनिया देखी है। वह नेशनल पब्लिक रेडियो के तीस देशों में विदेश संवाददाता रहे हैं। खुशी और भरोसे में रिश्ता तलाशती उनकी किताब है ‘द ज्योग्रॉफी ऑफ ब्लिस : अवर ग्रम्प्स सर्च फॉर द हैप्पिएस्ट प्लेसेज इन द वर्ल्ड।’
 
अजीब बात है कि हम जब अपने पर भरोसा करते हैं, तो दूसरे पर भी भरोसा करते हैं। हमें अपने पर भरोसा नहीं हो पाता, तो दूसरे पर भी नहीं होता। हम जब दूसरे पर भरोसा नहीं कर पाते, तो सबसे पहले अपने भीतर झांककर देखना चाहिए। भरोसा दूसरे में नहीं, अपने में होता है। यह अपना भरोसा दूसरे में दिखता है। आमतौर पर भरोसा करने वाले लोग वे होते हैं, जिन्हें अपने पर भरोसा होता है।

ऐसा नहीं है कि भरोसा टूटता ही नहीं। अगर हम ठीक से देखें, तो दस में एक शख्स हमारा भरोसा तोड़ता है। लेकिन वही एक हम पर इतना हावी हो जाता है कि हमारा भरोसे से ही भरोसा उठ जाता है।
 
सो, अपने पर भरोसा करो। कम से कम शुरुआत भरोसे से करो। यह मानकर चलो कि गलती हो सकती है। आखिर भरोसा न करना भी तो गलत साबित हो सकता है। हम कोई भी काम करते हैं, तो वह गलत हो सकता है। लेकिन वह बाद की बात है। असल बात यह है कि भरोसा हो। अपने में भी और दूसरे में भी। अपने में भरोसा हो, तो बाकी सब हो जाता है।

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